Thursday, 27 October 2011

गिरिराज गोवर्धन


श्री वृन्दावन धामजय राधे, जय कृष्ण, जय वृन्दावनश्रीगोविन्द, गोपानाथ, मदनमोहनश्यामकुण्ड, राधाकुण्ड, गिरि गोवर्धनकालिन्दी यमुना जय, जय महावनबद्धजीवों को पुन: आध्यात्मिक जगत् की ओर आकर्षित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण इस धरातल पर जन्म लेते हैं और अपनी सर्वाधिक आकर्षक दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं.जब-जब भगवान् अवतार लेते हैं, वे अपने दिव्य धाम, निकटतम पार्षदों, मित्रों और सेवकों के साथ अवतरित होते हैं, जो उनकी अनन्त लीलाओं में सहायता करते हैं.5000 वर्ष पूर्व पृथ्वी पर अवतरित होने से पूर्व भगवान ने अपने दिव्य धाम को पृथ्वी पर अवतरित होने भेजा.

इस जगत में स्थित वृंदावन धाम आध्यात्मिक जगत् में स्थित गोलोक वृंदावन धाम से अभिन्न है और हमें कभी भी इसे भौतिक जगत का भाग नहीं समझना चाहिए.अपनी लीलाओं का संवरण कर अपने धाम में लौटने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य धाम को पीछे छोड़ जाते हैं जिससे पृथ्वी पर उनके भक्त आश्रय ले सकें.भौतिक गणना के आधार पर इस दिव्य धाम की परिधि 84 कोस है. इसमें बारह वन हैं जहां श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाओं का आनंद लिया था. इन बारह वनों में वृंदावन को न केवल सबसे श्रेष्ठ माना जाता है अपितु वह सबसे बड़ा भी है. और यहीं भगवान ने अपने भक्तों के साथ सर्वाधिक गोपनीय लीलायें कीं.इस विशाल वृंदावन के मध्य स्थित है गोवर्धन पर्वत.

इसी पर्वत पर श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं एवं गोपियों के साथ असंख्य बाल्य लीलाएं की.गोवर्धन पर्वत की महिमास्तवावली में श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी श्रीगोवर्धन की महिमाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं:"संपूर्ण वैदिक साहित्य में गोवर्धन पर्वत को न केवल भारत का अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ पर्वत माना गया है. इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जब गोवर्धन पर्वत प्रकट हुआ तो ब्रह्माण्ड के समस्त पर्वत अपने राजा के रूप में उनकी पूजा करने के लिए आये. उन्होंने भी घोषित किया कि गोवर्धन पर्वत गोलोक वृंदावन से अवतरित हुए हैं और ब्रज के शिरोमणि हैं."वैदिक शास्त्र हमें बताते हैं कि गोवर्धन को दो प्रकार से समझा जा सकता है. पहला भगवान कृष्ण के महानतम भक्त के रूप में और दूसरा स्वंय श्रीकृष्ण के अभिन्न रूप में.वृंदावन की सुन्दर गोपियों के समक्ष श्रीमति राधारानी निम्नलिखित शब्दों में गोवर्धन की प्रशंसा करती हुई उन्हें भगवान कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ भक्त (हरिदास वर्य) बताती हैं-हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यायद् रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः।मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः।।"समस्त भक्तों में से यह गोवर्धन पर्वत सर्वश्रेष्ठ है. सखियों!

यह पर्वत कृष्ण तथा बलराम के साथ ही साथ उनकी गौवों, बछड़ों तथा गवालबालों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं- पीने का पानी, अति मुलायम घास, गुफाएं, फल, फूल, तरकारियों- की पूर्ति करता है. इस प्रकार यह पर्वत भगवान का आदर करता है. कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकर गोवर्धन पर्वत अत्यन्त हर्षित प्रतीत होता है."सर्वश्रेष्ठ सेवक के रूप में गोवर्धन पर्वत श्रीकृष्ण, बलराम एवं वृंदावन के निवासियों के जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करता है- बहते हुए झरनों से शीतल सुगंधित जल, शुद्ध शहद, आमरस, पीलू रस, विभिन्न प्रकार की औषधियां, कंदमूल, फल, पौधे और फूल. साथ ही साथ गोवर्धन अनेक खनिज और मूल्यवान रत्न प्रदान करता है जिसका उपयोग गोपबाल श्रीकृष्ण-बलराम और स्वंय को सजाने में करते हैं.इस दिव्य पर्वत में गहरी गुफायें हैं जहां श्रीकृष्ण-बलराम आराम करते हैं और भीषण गर्मी और वर्षा में उनका आश्रय लेते हैं. इन्हीं गुफाओं में श्रीकृष्ण श्रीमति राधारानी के साथ अत्यन्त प्रेममयी लीलाओं का भी आनंद लेते हैं.

गोवर्धन गायों के लिए विशेष प्रकार की कोमल और सुगंधित घास देता है जिन्हें खाकर गायें बलवान और स्वस्थ बनती हैं. यह घास गायों की दूध वृद्धि में सहायता करती है. दूध से शुद्ध घी बनाया जाता है और वह यज्ञ और भोजन बनाने में काम आता है. उसी दूध से दही, मक्खन, पनीर और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाई जाती हैं.यह जानते हुए कि यह दूध ब्रजवासियों की जीविका का आधार है, श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को सलाह दी कि वे इंद्रदेव के यज्ञ को रोककर गोवर्धन की पूजा करें.साथ ही साथ वैदिक साहित्य बताते हैं कि गोवर्धन पर्वत भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं. सन् 1515 में जब श्रीचैत्नय महाप्रभु ने ब्रज की यात्रा की तो उन्होंने गोवर्धन पर्वत पर चढ़ने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने गोवर्धन को भगवान कृष्ण से अभिन्न माना. अन्नकूट उत्सव के दौरान श्रीकृष्ण ने स्वंय घोषित किया कि वे गोवर्धन पर्वत से अभिन्न हैं-कृष्णस्तवन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः।शैलोSस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः।।तस्मै नमो ब्रजजनैः सह चक्र आत्मनात्मने।अहो पश्यत शैलोsसौ रूपी नोSनुग्रहं व्यधात्।।"

तत्पश्चात् कृष्ण ने गोपों में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए अभूतपूर्व विराट रूप धारण कर लिया औऱ यह घोषणा करते हुए कि, "मैं गोवर्धन पर्वत हूं" समस्त भोगों को खा लिया. श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों सहित गोवर्धन पर्वत के इस स्वरूप को नमन किया और इस प्रकार वास्तव में स्वंय को ही नमस्कार किया. तत्पश्चात् उन्होंने कहा, "जरा देखो तो! यह पर्वत किस प्रकार पुरुष रूप में प्रकट हुआ है और इसने हम पर कृपा की है।"क्योंकि गोवर्धन पर्वत श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं, गोवर्धन पर्वत की शिलायें श्रीकृष्ण के विग्रहों के ही समान पूजनीय हैं. यहां तक कि गोवर्धन शिला को प्रतिष्ठापित करने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन्हें पहले ही से पूजनीय विग्रह माना जाता है.

अनेक महान भक्त गोवर्धन शिला की पूजा करते थे- सनातन गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी और स्वंय चैत्नय महाप्रभु.गोवर्धन पर्वत का स्वरूप एक मोर के रूप के समान है. कुसुम सरोवर उसका मुख, मानसी गंगा कण्ठ, मुखारविन्द उसका मुख, राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड उसके नेत्र, बलराम स्थली उसकी पूंछ का आरंभ और पुंछरी कुण्ड (नवल कुण्ड) पूंछ का अन्त.गोवर्धन का प्राकट्यएक बार भगवान कृष्ण के पिता नंद महाराज ने अपने भाई उपानंद से वृंदावन में गोवर्धन के प्राकट्य के विषय़ में जिज्ञासा की. उपानंद ने कहा कि पाण्डवों के पिता पाण्डु ने यही प्रश्न भीष्म पितामह से पूछा था और उन्होंने गर्ग संहिता में निम्नलिखित कथा का वर्णन किया.गोलोक वृंदावन में एक समय श्रीकृष्ण ने श्रीमति राधारानी को बताया कि अभी पृथ्वी पर उनकी दिव्य लीलाओं का समय आ गया है और उन्हें पृथ्वी पर अवतरित होना होगा.

श्रीमति राधारानी ने उत्तर दिया कि ब्रजधाम, यमुना और गोवर्धन के बिना वे प्रसन्न नहीं रह सकतीं. तब श्रीकृष्ण ने श्रीमति राधारानी को आश्वासन दिया कि तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं हो क्योंकि यमुना और गोवर्धन के साथ ब्रजधाम पहले ही पृथ्वी पर अवतरित हो गये हैं.इस घटना के अनेक वर्षों पूर्व शाल्मली द्वीप में द्रोणाचल पर्वत की पत्नी ने गोवर्धन नामक पुत्र को जन्म दिया. गोवर्धन के जन्म के समय देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की, हिमालय और सुमेरु पर्वत की अगुवाई में महान् पर्वत उनका सम्मान करने आये और गोवर्धन की परिक्रमा कर उसे अपना राजा स्वीकार किया और उन्हें 'ब्रज शिरोमणि' के रूप में घोषित किया.

कुछ वर्षों पश्चात, सत्ययुग के आरम्भ में पुलस्त्य मुनि शाल्मद्वीप आये. गोवर्धन की सुन्दरता और समृद्धि को देखकर मुनि ने अनुभव किया यह पर्वत मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है. वे द्रोणाचल के पास गये. द्रोणाचल ने उन्हें देखते ही प्रणाम किया और सेवा करने की याचना की.पुलस्त्य मुनि ने कहा कि मैं काशी में रहता हूं और तीर्थयात्रा कर रहा हूं. यद्धपि काशी में गंगा बहती है किन्तु वहां कोई सुन्दर पर्वत नहीं है. यह कहते हुए उन्होंने द्रोणाचल से गोवर्धन की मांग की जिससे वह पर्वत पर बैठ कर तपस्या कर सकें.मुनि का निवेदन सुन द्रोणाचल अपने प्रिय पुत्र गोवर्धन के विहर के विचारों से अश्रु बहाने लगे. पुलस्त्य मुनि के क्रोध और परिणाम स्वरूप अपने पिता को उनके श्राप से बचाने के लिए गोवर्धन ने मुनि को उन्हें काशी ले जाने कहा.

जब पुलस्त्य मुनि अपने दाहिने हाथ पर उन्हें उठाकर ले जाने लगे तो गोवर्धन ने एक शर्त रखी- यदि यात्रा करते समय वे उन्हें कहीं बीच में रखेंगे तो पुनः उठा नहीं पायेंगे. मुनि मान गये और गोवर्धन के साथ काशी को प्रस्थान किया. भगवद्इच्छानुसार जब वे ब्रज पहुंचे, गोवर्धन ने सोचा कि यही वह दिव्य धाम है जहां उन्हें रहना चाहिए. उनकी दिव्य शक्ति से पुलस्त्य मुनि लघुशंका का अनुभव करने लगे. बिना ध्यान दिये उन्होंने गोवर्धन को नीचे रखा और लघुशंका करने गये. वापस आने पर भरपूर बल प्रयोग करने के बाद भी वे गोर्वधन को तिलभर भी नहीं हिला पाये.

क्रोधवश पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को श्राप दिया कि उनका आकार प्रतिदिन राई के बीज के समान छोटा होता जायेगा. उस समय गोवर्धन का आकार 64 मील लम्बा, 40 मील चौड़ा और 16 मील ऊंचा था. कहा जाता है कि कलयुग के दस हजार वर्ष बीतने पर वह पूर्णरूपेण अदृश्य हो जायेगा.कथा बताने के पश्चात् उपानंद ने बताया कि जब तक गोवर्धन और यमुना नदी रहेंगे कलियुग अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पायेगा. उन्होंने यह भी कहा कि जो भी गोवर्धन प्राकट्य की यह कथा सुनेगा समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा।
(भगवद्दर्शन नवंबर/दिसंबर 2002 से साभार)

Wednesday, 26 October 2011

ध्यान की एक सौ बारह विधियां: ओशो


कुछ भूमिका की बातें।एक कि विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है; वह दार्शनिक नहीं है। सिद्धांत इसके लिए अर्थ नहीं रखता। यह उपाय की, विधि की चिंता नहीं करता है, सिद्धांत कि कतई नहीं। तंत्र शब्द का अर्थ ही है विधि, उपाय, मार्ग। इसलिए यह कोई मीमांसा नहीं है, इस बात को ध्यान में रख लें।

बौद्धिक समस्याओं औऱ उनके उहापोह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह चीजों के बारे में 'क्यों' की चिंता नहीं लेता, उनके 'कैसे' की चिंता कर लेता है; सत्य क्या है इसकी नहीं, वरन इसकी की सत्य को कैसे उपलब्ध हुआ जाए।तंत्र का अर्थ विधि है। इसलिए यह एक विज्ञान-ग्रंथ है। विज्ञान 'क्यों' की नहीं, 'कैसे' की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता हैः अस्तित्व क्यों है? विज्ञान पूछता हैः यह अस्तित्व कैसे है?

जब तुम कैसे का प्रश्न पूछते हो, तब उपाय, विधि महत्वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाते हैं; अनुभव केंद्र बन जाता है।तंत्र विज्ञान है; तंत्र दर्शन नहीं है। दर्शन को समझना आसान है; क्योंकि उसके लिए सिर्फ मस्तिष्क की जरूरत पड़ती है। यदि तुम भाषा जानते हो, यदि तुम प्रत्यय समझते हो तो तुम दर्शन समझ सकते हो। उसके लिए तुम्हें बदलने की, संपरिवर्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। तुम जैसे हो वैसे ही बने रहकर दर्शन को समझ सकते हो। लेकिन वैसे ही रहकर तंत्र को नहीं समझ सकते ।

तंत्र को समझने के लिए तुम्हारे बदलने की जरूरत रहेगी; बदलाहट की ही नहीं, आमूल बदलाहट की जरूरत होगी। जब तक तुम बिल्कुल भिन्न नहीं हो जाते हो, तब तक तंत्र को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि तंत्र कोई बौद्धिक प्रस्तावना नहीं है; वह एक अनुभव है। और जब तक तुम अनुभव के प्रति संवेदनशील, तैयार, खुले हुए नहीं होते, तब तक यह अनुभव तुम्हारे पास आने को नहीं है।दर्शन की फिक्र तुम्हारे मन के साथ है। उसके लिए तुम्हारा मस्तिष्क काफी है, उसको तुम्हारी समग्रता नहीं चाहिए।

तंत्र तुमको तुम्हारी समग्रता में मांगता है। यह बहुत गहरी चुनौती है; इसमें तुम पूरे और इकट्ठे होकर ही उतर सकते हो। तंत्र खंडित नहीं है। उसकी अगवानी के लिए और ही तरह के रुझान, और ही तरह की यात्रा, और ही तरह के मन की जरूरत है।यही कारण है कि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक प्रश्न जैसे दिखते हैं। विज्ञान भैरव तंत्र देवी के प्रश्नों से शुरू होता है। तंत्र गैर-दार्शनिक है और अस्तित्वगत है। इसलिए यद्यपि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक मालूम होते हैं, लेकिन शिव उत्तर उसी ढंग से नहीं देते। इस बात को आरंभ में ही समझ लेना बेहतर होगा। नहीं तो तुम हैरानी में पड़ोगे कि शिव क्यों उनके एक प्रश्न का भी उत्तर नहीं देते। जो भी प्रश्न देवी पूछती हैं, शिव उनके उत्तर ही नहीं देते। औऱ तो भी वे उत्तर देते हैं। और सच तो यह है कि केवल शिव ने ही उनके उत्तर दिए हैं, किसी औऱ ने नहीं। लेकिन उनके उत्तर भिन्न तल के हैं।देवी पूछती हैं:प्रभो आपका सत्य क्या है?

शिव इस प्रश्न का उत्तर न देकर उसके बदले में एक विधि देते हैं। अगर देवी इस विधि के प्रयोग से गुजर जाएं तो वे उत्तर पा जाएंगी। इसलिए उत्तर परोक्ष है, प्रत्यक्ष नहीं। शिव नहीं बताते हैं कि मैं कौन हूं, वे एक विधि भर बताते हैं। वे कहते हैं: यह करो और तुम जान जाओगी।ये एक सौ बारह विधियां सभी लोगों के काम आ सकती हैं। हो सकता है, कोई विशेष उपाय तुमको ठीक न पड़े। इसलिए तो शिव अनेक उपाय बताते चले जाते हैं। कोई एक विधि चुन लो जो तुमको जंच जाए। और यह जानना कठिन नहीं है कि कौन सी विधि तुम्हें जंचती है।

हम यहां प्रत्येक विधि को समझने की कोशिश करेंगे और बताएंगे कि कैसे तुम अपने लिए वही विधि चुन लो जो कि तुम्हें और तुम्हारे मन को रूपांतरित कर दे। यह समझ, यह बौद्धिक समझ बुनियादी तौर से जरूरी है, लेकिन यह अंत नहीं है। जिस विधि की भी चर्चा मैं यहां करूं उसको प्रयोग करो। सच में यह है कि जब तुम अपनी सही विधि का प्रयोग करते हो तब झट से उसका तार तुम्हारे किसी तार से लगकर बज उठता है।इसलिए मैं यहां रोज-रोज विधियों की चर्चा किए जाऊंगा। तुम प्रयोग करना। बस उनसे खेलना। घर जाना और प्रयोग करना। और प्रयोग करते-करते जब तुम अपनी विधि के पास पहुंचोगे तो वह तुम्हारे भीतर खट से बज उठेगी, वह तुम्हें घेर लेगी। तुम्हारे भीतर कुछ विस्फोट सा होगा और तुम जानोगे कि यह विधि मेरे लिए है।

लेकिन प्रयास जरूरी है। और तुम चकित रह जाओगे कि किसी दिन एक विधि ने तुम्हें बस आच्छादित कर लिया है।इसलिए इधर मैं उनकी चर्चा किए जाऊंगा और उधर साथ ही साथ तुम उनके साथ खेलते जाना। मैं खेलना शब्द का व्यवहार करता हूं, क्योंकि तुम्हें बहुत गंभीर नहीं होना है। बस खेलना। और खेल-खेल में ही तुम्हें कुछ जंच जाएगा। जब जंच जाए तब गंभीर हो जाना, तब उसमें गहरे उतर जाना-तीव्रता से, निष्ठा से, पूरी ऊर्जा के साथ, पूरे मन से। लेकिन उसके पहले बस खेलना।मैंने देखा है कि जब तुम खेलते हो तो तुम्हारा मन अधिक खुला रहता है।

गंभीर होने पर वह उतना खुला नहीं होता, बंद होता है। इसलिए खेलना भर। गंभीर नहीं होना, खेलना। और ये विधियां बहुत सरल हैं। तुम उनके साथ खेल सकते हो।एक विधि लो और उसके साथ तन दिन खेलो। अगर तुम्हें उसके साथ निकटता की अनुभूति हो, अगर उसके साथ तुम थोड़ा स्वस्थ महसूस करो, अगर तुम्हें लगे कि यह तुम्हारे लिए है तो फिर उसके प्रति गंभीर हो जाओ। तब दूसरी विधियों को भूल जाओ, उनसे खेलना बंद करो। औऱ अपनी विधि के साथ टिको, कम से कम तीन महीने टिको। चमत्कार संभव है।

बस इतना होना चाहिए कि वह विधि सचमुच तुम्हारे लिए हो। यदि तुम्हारे लिए नहीं है तो कुछ नहीं होगा। और अगर विधि तुम्हारे लिए है तो तीन मिनट काफी हैं।ये एक सौ बारह विधियां तुम्हारे लिए चमत्कारिक अनुभव बन सकती हैं, या तुम उन्हें महज सुन सकते हो। यह तुम पर निर्भर है, मैं सभी संभव पहलुओं से विधि की व्याख्या करूंगा। अगर तुम उसके साथ कुछ निकटता अनुभव करो तो तीन दिनों तक उससे खेलो और फिर तीन महीने उसके साथ प्रयोग करो।

जीवन चमत्कार है। अगर हमने उसके रहस्य को नहीं जाना हैतो उससे यही जाहिर होता है कि तुम्हें उसके पास पहुंचने की विधि नहीं मालूम है।शिव यहां एक सौ बारह विधियां प्रस्तावित कर रहे हैं। इसमें सभी संभव विधियों सम्मिलित हैं। यदि इनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर नहीं 'जंचती' है, कोई भी तुम्हें यह भाव नहीं देती है कि वह तुम्हारे लिए है तो फिर कोई भी विधि तुम्हारे लिए नहीं बची। इसे ध्यान में रखो। तब आध्यात्म को भूल जाओ और खुश रहो। वह तब तुम्हारे लिए नहीं है।लेकिन ये एक सौ बारह विधियां तो समस्त मानव-जाति के लिए हैं। और वे उन सभी युगों के लिए हैं जो गुजर गए हैं औऱ आने वाले हैं। और किसी भी युग में एक भी आदमी नहीं हुआ और न होने वाला ही है, जो कह सके कि ये सभी एक सौ बारह विधियां मेरे लिए व्यर्थ हैं। असंभव! यह असंभव है!

प्रत्येक ढंग के चित्त के लिए यहां गुंजाइश है। तंत्र में प्रत्येक किस्म के चित्त के लिए विधि है। कई विधियां हैं जिनके उपयुक्त मनुष्य अभी उपलब्ध नहीं हैं, वे भविष्य के लिए हैं। और ऐसी विधियां भी हैं जिनके उपयुक्त लोग रहे नहीं, वे अतीत के लिए हैं। लेकिन डर मत जाना। अनेक विधियां हैं जो तुम्हारे लिए ही हैं।

तंत्र-सूत्र 1 प्रवचन 1(संस्करणः 1993) (ओशो टाइम्स, अंक फरवरी 2000)

सावधिक संन्यासः ग्यारह महीने संसार, एक महीना संन्यास


मेरे मन में इधर बहुत दिनों से एक बात निरंतर ख्याल में आती है और वह है कि सारी दुनिया से आने वाले दिनों में संन्यासी के समाप्त हो जाने की संभावना है। संन्यासी आने वाले पचास वर्षों के बाद पृथ्वी पर नहीं बच सकेगा। वह संस्था विलीन हो जाएगी। उस संस्था के नीचे की ईंट तो खिसका ही दी गई हैं, उसका मकान भी गिर जाएगा। लेकिन संन्यास इतनी बहुमूल्य चीज है कि जिस दिन दुनिया से विलीन हो जाएगी उस दिन दुनिया का बहुत अहित हो जाएगा।मेरे देखे, संन्यासी तो चला जाना चाहिए, संन्यास बच जाना चाहिए। और उसके लिए पीरियाडिकल संन्यास का, पीरियाडिकल रिनन्सिएशन का मेरे मन में ख्याल है।

वर्ष में, ऐसा कोई आदमी नहीं होना चाहिए, जो एकाध महीने के लिए संन्यास न ले ले। जीवन में तो कोई भी ऐसा आदमी नहीं होना चाहिए जो दो-चार बार संन्यासी न हो गया हो।स्थायी संन्यास खतरनाक सिद्ध होता है, कि कोई आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी हो जाए। उसके दो खतरे हैं. एक खतरा तो यह है कि वह आदमी जीवन से दूर हट जाता है। और परमात्मा की, प्रेम की, या आनंद की जोभी उपलब्धियां हैं, वे जीवन के घनीभूत अनूभव में हैं, जीवन के बाहर नहीं। दूसरी बात यह होती है कि जो आदमी जीवन से हट जाता है, उसकी जो शांति, उसका जो आनंद है, वह जीवन में बिखरने से बच जाता है, जीवन उसका साझीदार नहीं हो पाता। तीसरी बात यह है, लोगों को यह ख्याल पैदा हो जाता है कि गृहस्थ अलग है और संन्यासी अलग है। तो गलत काम करते वक्त भी हमें यह ख्याल रहता है कि हम तो गृहस्थ हैं, यह तो करना हमारी मजबूरी है, संन्यासी हो जाएंगे तो हम नहीं करेंगे। तो धर्म और जीवन के बीच एक फासला पैदा हो जाता है।

मेरी दृष्टि में, संन्यास जीवन का अंग होना चाहिए। संन्यास जीवन को समझने औऱ पहचानने की विधि होनी चाहिए। ऐसे आदमी का जीवन अधूरा औऱ अधूरी शिक्षा माननी चाहिए उसकी, जो आदमी वर्ष में थोड़े दिनों के लिए संन्यासी न हो जाता हो। अगर बारह महीने में एक महीने या दो महीने कोई व्यक्ति परिपुर्ण संन्यासी का जीवन जीता हो तो उसके जीवन में आनंद के इतने द्वार खुल जाएंगे जिसकी उसे कल्पना भी नहीं हो सकती। इन दो महीनों में दुनिया से उसका संबंध नहीं है। संन्यासी का भी जितना संबंध होता है दुनिया से उतना भी उसका दो महीने में संबंध नहीं है।और यह जान कर आपको हैरानी होगी, जो आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी हो जाता है वह गृहस्थियों के ऊपर निर्भर हो जाता है। इसलिए वह दिखता तो है कि संसार से दूर गया, लेकिन संसार के पास उसे रहना पड़ता है।

लेकिन जो आदमी बारह महीने में दो महीने संन्यासी होता है वह किसी के ऊपर निर्भर नहीं होता, वह अपने ही दस महीने का जो गृहस्थ जीवन था उस पर निर्भर होता है। वह संसार के ऊपर आश्रित नहीं होता। इसलिए किसी से भयभीत भी नहीं होता, किसी से संबंधित भी नहीं होता।अगर एक आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी होगा तो वह किसी का आश्रित होगा ही; वह बच नहीं सकेगा। और अंतिम परिणाम यह होता है कि संन्यासी दिखाई तो पड़ते हैं कि हमारे नेता हैं, लेकिन वे अनुयायियों के लिए भी अनुयायी हो जाते हैं। वे उनके भी पीछे चलते हैं। संन्यासियों को आज्ञा देते हैं गृहस्थ कि तुम ऐसा करो और वैसा मत करो। गृहस्थ उनका मालिक हो जाता है, क्योंकि उनको रोटी देता है।संन्यासी गुलाम हो जाता है।

संन्यासी की गुलामी टूट सकती है एक ही रास्ते से कि आदमी कभी-कभी संन्यासी हो। तब वह किसी पर निर्भर नहीं है। वह अपनी ग्यारह महीने की कमाई पर निर्भर है। किसी से उसको लेना-देना नहीं है।और यह एक महीने वह पूरी फ्रीडम, पूरी स्वतंत्रता का उपयोग कर सकता है, बिना किसी आश्रय के। तो यह एक महीने में वह परिपूर्ण संन्यास का अनुभव करेगा जो कि कोई संन्यासी कभी नहीं कर पाता है। तब वह पूर्ण रूप से जी सकता है।और यह एक महीने में जिस विधि से वह जीएगा और जिस आनंद को, जिस शांति को अनुभव करेगा, और जिस स्वतंत्रता में प्रवेश करेगा- वापस लौट जाएगा एक महीने के बाद जिंदगी में। वापस लौट जाएगा और जिंदगी के घनेपन में प्रयोग करेगा कि जो उसने एकांत में सीखा था, क्या भीड़ में उसका उपयोग कर सकता है?क्योंकि एकांत में शिक्षा होती है, भीड़ में परीक्षा होती है। जो भीड़ से बच जाता है। उसकी शिक्षा अधूरी रह जाती है।

जो मैंने अकेले में जाना है, अगर भीड़ में मैं उसका उपयोग नहीं कर सकता हूं तो वह जानना गलत है। वह बहुत मूल्य का नहीं है। वहां कसौटी है, क्योंकि वहां विरोध है, वहां परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, वहां प्रतिकूल हैं। वहां भी मैं शांत रह सकता हूं या नहीं? वहां भी मैं अपने भीतर जिस संन्यास को मैंने एक महीने साधा है और जो आनंद पाया है, क्या मैं घर के भीतर, दुकान पर बैठ कर भी उस संन्यास को साध सकता हूं या नहीं?यह ग्यारह महीना उसे निरीक्षण करना है, आब्जर्व करना है। वर्ष भर बाद उसे फिर महीने भर के लिए लौट आना है। ताकि वह फिर जो वर्ष भर में उसने अनुभव किया है परीक्षा से गुजर कर, उसे और गहरा कर सके। पिछले वर्ष जहां गया था, और नयी सीढ़ियां पार कर सके।

अगर एक आदमी बीस साल की उम्र के बाद सत्तर साल तक जीए और पचास वर्षों में पचास महीने के लिए संन्यासी हो जाए-इस जगत में ऐसा कोई सत्य नहीं है जिससे वह अपरिचित रह जाए, ऐसी कोई अनुभूति नहीं है जिससे वह अनजाना रह जाए।और यह जो रिनन्सिएशन होगा पीरियाडिकल, यह जो एक अवधि के लिए लिया गया संन्यास होगा, यह उसे जीवन से नहीं तोड़ेगा।अन्यथा हमारा संन्यासी जो है वह जीवन-विरोधी हो गया। पत्नी और बच्चे उससे भयभीत हैं, मां-बाप उससे भयभीत हैं, क्योंकि वह तो जीवन को उजाड़ कर चला जाएगा।

यह जो कभी-कभी संन्यासी होता है, इससे जीवन को भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं। बल्कि जब यह लौटेगा तो इसकी पत्नी पाएगी कि और भी ज्यादा प्यारा पति होकर लौटा है। उसके बच्चे पाएंगे, वह ज्यादा बेहतर बाप होकर लौटा है। उसकी मां पाएगी कि वह ज्यादा श्रद्धा, ज्यादा प्रेम से, आदर से भरा हुआ बेटा होकर लौटा है।और तब इस एक महीने के बाद जो वह ग्यारह महीने घर में जीएगा और जो सुगंध उसने पाई है वह बिखरेगी उसके संबंधों में, तो वह दुनिया को बनाएगा।

अब तक संन्यासी ने दुनिया को उजाड़ा है और बिगाड़ा है, उसको बनाया नहीं है। वह जीवन को निर्मित करने में, सृजन करने में सहयोगी और मित्र हो जाएगा।तो मेरे मन में, एक अवधि के लिए संन्यास अनिवार्य है, वह मेरे ख्याल में है। इस भांति संन्यासी तो दुनिया से समाप्त हो जाए तो फिर कोई डर नहीं है, संन्यास बचा रहेगा। और इस भांति जो संन्यास व्यापक रूप से डिफ्यूज हो जाएगा बड़े पैमाने पर, क्योंकि हर आदमी को हक हो जाएगा फिर संन्यासी होने का-अभी हर आदमी को हक नहीं हो सकता। क्योंकि अभी हर आदमी संन्यासी हो जाए तो जीवन एक मरघट बन जाए, मृत्यु बन जाए।और जो काम हर आदमी न कर सकता हो, उस काम में कोई भूल है। जो काम हर आदमी का अधिकार न बन सकता हो, उसमें कोई भूल है।अगर सारे लोग संन्यासी हो जाएं तो जीवन आज उजड़ जाए, इसी क्षण, तो जो संन्यासी भी हैं उनको भी वापस लौट आना पड़े। तो यह जो आजीवन संन्यास है यह भ्रांत है, यह गलत है। ऐसा संन्यास बच सके दुनिया में, उसके लिए एक बड़ा गहरा प्रयोग करना जरूरी है।

अनंत की पुकार प्रवचन 5 से संकलित

Tuesday, 18 October 2011

कैसे आए समृद्धि- ओशो


हमारी जरूरतें जितनी कम होंगी, उतनी जल्दी हम समृद्ध हो जाते हैं. जरूरतें ज्यादा हों, तो उतनी ही देर लगती है समृद्ध होने में. जरूरतें बहुत ज्यादा हों, तो हम कभी समृद्ध नहीं हो सकते. समृ्द्धि धन से नहीं आंकी जाती. समृद्धि तो धन और जरूरतों के बीच का फासला है। फासला कम है, तो हम समृद्ध हैं, फासला नहीं है, तो हम सम्राट हैं. अगर फासला बहुत ज्यादा है, तो समझो हम दरिद्र हैं.

मान लीजिए, एक व्यक्ति की जरूरतें एक रुपये में पूरी हो जाती हैं और उसके पास दस रुपये हैं, वहीं एक दूसरा आदमी है, जिसके पास पांच अरब रुपये हैं, लेकिन उसकी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो दोनों में समृ्द्ध कौन है ? पांच अरब रुपये वाले के पास उसकी जरूरतों के आधे रुपये हैं, जबकि दस रुपये वाले के पास उसकी जरूरतों से दस गुने. जाहिर है, समृद्ध दस रुपये वाला है.

मेरा मानना है कि समृद्ध व्यक्ति ही धर्म में प्रवेश करता है, लेकिन समृद्धि का अर्थ धन-संपत्ति से नहीं. हमारी जरूरतें इतनी कम हों कि हम जब भी, जैसे भी हों, वहीं समृद्ध होने का अहसास हो. जब जरूरतें थोड़ी होंगी तो जल्दी पूरी हो जाएंगी, तब हमारी उर्जा जीवन यात्रा पर निकलेगी. जब हमारी जरूरतें पूरी होंगी, तो हम दूसरे संसार की यात्रा पर निकल पड़ेंगे. तब हम तैयार हैं, खूटियां छोड़ सकते हैं, पाल फैला सकते हैं. क्योंकि इस किनारे की हमारी जरूरतें पूरी हो चुकी हैं.

अपनी जरूरतों को घटाते जाओ. व्यर्थ को छोड़ते जाओ. जो बहुत जरूरी है, वह बहुत थोड़ा है. बहुत थोड़े में आदमी की तृप्ति हो जाती है. तुम्हारी प्यास के लिए समुद्र की जरूरत नहीं, छोटा-सा झरना ही काफी है. समुद्र से कभी किसी की तृप्ति हुई है? धन तो समुद्र का खारा पानी है, जितना पीते हो, उतनी प्यास बढ़ती है. समुद्र का पानी पीकर आदमी मर सकता है, जी नहीं सकता. छोटे से झरने का चुल्लू भर पानी पीकर भी तृप्त हुआ जा सकता है.

समृद्ध वही है, जो अपनी जरूरतों को जरूरत समझता है और गैर-जरूरतों को गैर-जरूरत. सोने-चांदी से न तो प्यास बुझती है, न हीरे जवाहरातों से भूख. जिसने यह बात समझ ली और व्यर्थ के विस्तार को छोड़ दिया, उसे परम तृप्ति का स्वाद आता है. यही तृप्ति समृद्धि है.

तमाम उपाय प्रवंचना हैं. जो भी दौड़-धूप दिखाई दे रही है कि संसार में बहुत काम हो रहा ह, बड़ी समृद्धि हो रही है, बड़ा विकास हो रहा ह, वह कुछ भी नहीं. इसमें पचास प्रतिशत तो बिल्कुल व्यर्थ है. शेष पचास प्रतिशत ऐसा है, जो युद्ध, संघर्ष, कलह की तैयारी में जा रहा है. पचास प्रतिशत प्रसाधन के साधन हैं कि खो गया सौंदर्य कैसे बचाया जाए या कैसे दिखाया जाए कि खोया हुआ सौंदर्य नहीं खोया है. धोखा, प्रवंचना. पचास प्रतिशत खोए हुए सौंदर्य को धोखा देने के लिए और चालिस प्रतिशत जीवन का अंत करने के लिए कि बचे हुए जीवन पर हाइड्रोजन और एटम बम कैसे गिराया जाए. यह 90 प्रतिशत मनुष्य की सभ्यता है. बाकी दस प्रतिशत बचता है. उस दस प्रतिशत में आधी दुनिया भूखी है. एक जून रोटी नहीं है. छप्पर नहीं है, औषधी नहीं है. क्या यही हमारी सभ्यता है?

अगर हम जीवन की जरूरतों को पूरा करने में लगें, जैसा लाओत्से चाहता है, जैसा मैं चाहता हूं, तो झूठे सौंदर्य प्रसाधनों, झूठी प्रतिष्ठा के उपाय, झूठी महत्वाकांक्षा की तृप्ति में पचास प्रतिशत श्रम का अंत होगा. इसी प्रतिस्पर्धा से पैदा होता है युद्ध, जिसमें चालीस प्रतिशत शक्ति व्यय हो रही है. अगर पूरी नब्बे प्रतिशत शक्ति जीवन की जरूरतों को पूरा करने में लगाई जाए, तो इतनी जरूरतें पूरी हो जाएंगी कि बची हुई विराट उर्जा सेल संस्कृति का निर्माण होगा.

लेकिन उर्जा हो, तब तो संस्कृति का निर्माण हो. अभी तो उर्जा बचती नहीं. अभी हम व्यर्थ के गोरखधंधों में समय व्यर्थ कर देते हैं. हम थके-हारे रात को घर लौटते हैं, किसी तरह सो भी नहीं पाते, क्योंकि दिन में जो चिंताएं इकट्ठी की हैं, वे रात भर पीछा करती हैं. दिन में व्यर्थ की दौड़-धूप और रात बन जाती है दुख-स्वप्न. एक दिन लगता है कि जीवन समाप्त हो गया. क्या यही संस्कृति है?

यह न सभ्यता है, न संस्कृति. क्योंकि इसमें न प्रेम है, न प्रार्थना. इसमें सब दिखावा है. खेत-खलिहान सूखे पड़े हैं और दरबार में रोशनी है. लोग तलवारें लिए खड़े हैं और सम्राट हीरे-जवाहरातों के सिंहासन पर बैठा है. इधर आदमी की बुनायादी जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं. कुछ ज्यादा खाकर बीमार हो रहे हैं, तो कुछ भूख से बीमार हैं. कुछ इसलिए बीमार है कि जीवन को संभालने का उपाय नहीं, कुछ इसलिए बीमार हैं कि उनके पास इतना ज्यादा है कि जानते नहीं करें क्या। यह सभ्यता नहीं, एक असभ्य स्थिति है.

संस्कृति तो तब पैदा होगी, जब लोग तृप्त होंगे और लोगों के पास जीवन बचेगा. अभी जो बचता है, वह युद्ध में चला जाता है. युद्ध संस्कृति नहीं भयानक रोग है. लेकिन अगर हम लाओत्से को सुनें, महापुरुषों को सुनें, तो दूसरी व्यवस्था पैदा होगी. इस व्यवस्था का आधार यह होगा कि हमारी जरूरतें पूरी होनी चाहिए. लेकिन जरूरतें तो बहुत कम में पूरी हो जाती हैं. असली काम गैर-जरूरतों को छांटना है, उन्हें जरूरतों से अलग करना है. समृद्ध वही है, जिसकी जरूरतें अल्प में पूरी हो जाती हैं और पूरा जीवन शेष रह जाता है. उसकी पूरी उर्जा बच जाती है. उस उर्जा को वह सृजन में, संगीत में, समाधि में लगा सकता है, जो उसे परमात्मा तक ले जाती है.

(दैनिक जागरण से साभार)