Thursday, 27 October 2011

गिरिराज गोवर्धन


श्री वृन्दावन धामजय राधे, जय कृष्ण, जय वृन्दावनश्रीगोविन्द, गोपानाथ, मदनमोहनश्यामकुण्ड, राधाकुण्ड, गिरि गोवर्धनकालिन्दी यमुना जय, जय महावनबद्धजीवों को पुन: आध्यात्मिक जगत् की ओर आकर्षित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण इस धरातल पर जन्म लेते हैं और अपनी सर्वाधिक आकर्षक दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं.जब-जब भगवान् अवतार लेते हैं, वे अपने दिव्य धाम, निकटतम पार्षदों, मित्रों और सेवकों के साथ अवतरित होते हैं, जो उनकी अनन्त लीलाओं में सहायता करते हैं.5000 वर्ष पूर्व पृथ्वी पर अवतरित होने से पूर्व भगवान ने अपने दिव्य धाम को पृथ्वी पर अवतरित होने भेजा.

इस जगत में स्थित वृंदावन धाम आध्यात्मिक जगत् में स्थित गोलोक वृंदावन धाम से अभिन्न है और हमें कभी भी इसे भौतिक जगत का भाग नहीं समझना चाहिए.अपनी लीलाओं का संवरण कर अपने धाम में लौटने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य धाम को पीछे छोड़ जाते हैं जिससे पृथ्वी पर उनके भक्त आश्रय ले सकें.भौतिक गणना के आधार पर इस दिव्य धाम की परिधि 84 कोस है. इसमें बारह वन हैं जहां श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाओं का आनंद लिया था. इन बारह वनों में वृंदावन को न केवल सबसे श्रेष्ठ माना जाता है अपितु वह सबसे बड़ा भी है. और यहीं भगवान ने अपने भक्तों के साथ सर्वाधिक गोपनीय लीलायें कीं.इस विशाल वृंदावन के मध्य स्थित है गोवर्धन पर्वत.

इसी पर्वत पर श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं एवं गोपियों के साथ असंख्य बाल्य लीलाएं की.गोवर्धन पर्वत की महिमास्तवावली में श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी श्रीगोवर्धन की महिमाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं:"संपूर्ण वैदिक साहित्य में गोवर्धन पर्वत को न केवल भारत का अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ पर्वत माना गया है. इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जब गोवर्धन पर्वत प्रकट हुआ तो ब्रह्माण्ड के समस्त पर्वत अपने राजा के रूप में उनकी पूजा करने के लिए आये. उन्होंने भी घोषित किया कि गोवर्धन पर्वत गोलोक वृंदावन से अवतरित हुए हैं और ब्रज के शिरोमणि हैं."वैदिक शास्त्र हमें बताते हैं कि गोवर्धन को दो प्रकार से समझा जा सकता है. पहला भगवान कृष्ण के महानतम भक्त के रूप में और दूसरा स्वंय श्रीकृष्ण के अभिन्न रूप में.वृंदावन की सुन्दर गोपियों के समक्ष श्रीमति राधारानी निम्नलिखित शब्दों में गोवर्धन की प्रशंसा करती हुई उन्हें भगवान कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ भक्त (हरिदास वर्य) बताती हैं-हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यायद् रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः।मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः।।"समस्त भक्तों में से यह गोवर्धन पर्वत सर्वश्रेष्ठ है. सखियों!

यह पर्वत कृष्ण तथा बलराम के साथ ही साथ उनकी गौवों, बछड़ों तथा गवालबालों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं- पीने का पानी, अति मुलायम घास, गुफाएं, फल, फूल, तरकारियों- की पूर्ति करता है. इस प्रकार यह पर्वत भगवान का आदर करता है. कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकर गोवर्धन पर्वत अत्यन्त हर्षित प्रतीत होता है."सर्वश्रेष्ठ सेवक के रूप में गोवर्धन पर्वत श्रीकृष्ण, बलराम एवं वृंदावन के निवासियों के जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करता है- बहते हुए झरनों से शीतल सुगंधित जल, शुद्ध शहद, आमरस, पीलू रस, विभिन्न प्रकार की औषधियां, कंदमूल, फल, पौधे और फूल. साथ ही साथ गोवर्धन अनेक खनिज और मूल्यवान रत्न प्रदान करता है जिसका उपयोग गोपबाल श्रीकृष्ण-बलराम और स्वंय को सजाने में करते हैं.इस दिव्य पर्वत में गहरी गुफायें हैं जहां श्रीकृष्ण-बलराम आराम करते हैं और भीषण गर्मी और वर्षा में उनका आश्रय लेते हैं. इन्हीं गुफाओं में श्रीकृष्ण श्रीमति राधारानी के साथ अत्यन्त प्रेममयी लीलाओं का भी आनंद लेते हैं.

गोवर्धन गायों के लिए विशेष प्रकार की कोमल और सुगंधित घास देता है जिन्हें खाकर गायें बलवान और स्वस्थ बनती हैं. यह घास गायों की दूध वृद्धि में सहायता करती है. दूध से शुद्ध घी बनाया जाता है और वह यज्ञ और भोजन बनाने में काम आता है. उसी दूध से दही, मक्खन, पनीर और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाई जाती हैं.यह जानते हुए कि यह दूध ब्रजवासियों की जीविका का आधार है, श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को सलाह दी कि वे इंद्रदेव के यज्ञ को रोककर गोवर्धन की पूजा करें.साथ ही साथ वैदिक साहित्य बताते हैं कि गोवर्धन पर्वत भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं. सन् 1515 में जब श्रीचैत्नय महाप्रभु ने ब्रज की यात्रा की तो उन्होंने गोवर्धन पर्वत पर चढ़ने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने गोवर्धन को भगवान कृष्ण से अभिन्न माना. अन्नकूट उत्सव के दौरान श्रीकृष्ण ने स्वंय घोषित किया कि वे गोवर्धन पर्वत से अभिन्न हैं-कृष्णस्तवन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः।शैलोSस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः।।तस्मै नमो ब्रजजनैः सह चक्र आत्मनात्मने।अहो पश्यत शैलोsसौ रूपी नोSनुग्रहं व्यधात्।।"

तत्पश्चात् कृष्ण ने गोपों में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए अभूतपूर्व विराट रूप धारण कर लिया औऱ यह घोषणा करते हुए कि, "मैं गोवर्धन पर्वत हूं" समस्त भोगों को खा लिया. श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों सहित गोवर्धन पर्वत के इस स्वरूप को नमन किया और इस प्रकार वास्तव में स्वंय को ही नमस्कार किया. तत्पश्चात् उन्होंने कहा, "जरा देखो तो! यह पर्वत किस प्रकार पुरुष रूप में प्रकट हुआ है और इसने हम पर कृपा की है।"क्योंकि गोवर्धन पर्वत श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं, गोवर्धन पर्वत की शिलायें श्रीकृष्ण के विग्रहों के ही समान पूजनीय हैं. यहां तक कि गोवर्धन शिला को प्रतिष्ठापित करने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन्हें पहले ही से पूजनीय विग्रह माना जाता है.

अनेक महान भक्त गोवर्धन शिला की पूजा करते थे- सनातन गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी और स्वंय चैत्नय महाप्रभु.गोवर्धन पर्वत का स्वरूप एक मोर के रूप के समान है. कुसुम सरोवर उसका मुख, मानसी गंगा कण्ठ, मुखारविन्द उसका मुख, राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड उसके नेत्र, बलराम स्थली उसकी पूंछ का आरंभ और पुंछरी कुण्ड (नवल कुण्ड) पूंछ का अन्त.गोवर्धन का प्राकट्यएक बार भगवान कृष्ण के पिता नंद महाराज ने अपने भाई उपानंद से वृंदावन में गोवर्धन के प्राकट्य के विषय़ में जिज्ञासा की. उपानंद ने कहा कि पाण्डवों के पिता पाण्डु ने यही प्रश्न भीष्म पितामह से पूछा था और उन्होंने गर्ग संहिता में निम्नलिखित कथा का वर्णन किया.गोलोक वृंदावन में एक समय श्रीकृष्ण ने श्रीमति राधारानी को बताया कि अभी पृथ्वी पर उनकी दिव्य लीलाओं का समय आ गया है और उन्हें पृथ्वी पर अवतरित होना होगा.

श्रीमति राधारानी ने उत्तर दिया कि ब्रजधाम, यमुना और गोवर्धन के बिना वे प्रसन्न नहीं रह सकतीं. तब श्रीकृष्ण ने श्रीमति राधारानी को आश्वासन दिया कि तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं हो क्योंकि यमुना और गोवर्धन के साथ ब्रजधाम पहले ही पृथ्वी पर अवतरित हो गये हैं.इस घटना के अनेक वर्षों पूर्व शाल्मली द्वीप में द्रोणाचल पर्वत की पत्नी ने गोवर्धन नामक पुत्र को जन्म दिया. गोवर्धन के जन्म के समय देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की, हिमालय और सुमेरु पर्वत की अगुवाई में महान् पर्वत उनका सम्मान करने आये और गोवर्धन की परिक्रमा कर उसे अपना राजा स्वीकार किया और उन्हें 'ब्रज शिरोमणि' के रूप में घोषित किया.

कुछ वर्षों पश्चात, सत्ययुग के आरम्भ में पुलस्त्य मुनि शाल्मद्वीप आये. गोवर्धन की सुन्दरता और समृद्धि को देखकर मुनि ने अनुभव किया यह पर्वत मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है. वे द्रोणाचल के पास गये. द्रोणाचल ने उन्हें देखते ही प्रणाम किया और सेवा करने की याचना की.पुलस्त्य मुनि ने कहा कि मैं काशी में रहता हूं और तीर्थयात्रा कर रहा हूं. यद्धपि काशी में गंगा बहती है किन्तु वहां कोई सुन्दर पर्वत नहीं है. यह कहते हुए उन्होंने द्रोणाचल से गोवर्धन की मांग की जिससे वह पर्वत पर बैठ कर तपस्या कर सकें.मुनि का निवेदन सुन द्रोणाचल अपने प्रिय पुत्र गोवर्धन के विहर के विचारों से अश्रु बहाने लगे. पुलस्त्य मुनि के क्रोध और परिणाम स्वरूप अपने पिता को उनके श्राप से बचाने के लिए गोवर्धन ने मुनि को उन्हें काशी ले जाने कहा.

जब पुलस्त्य मुनि अपने दाहिने हाथ पर उन्हें उठाकर ले जाने लगे तो गोवर्धन ने एक शर्त रखी- यदि यात्रा करते समय वे उन्हें कहीं बीच में रखेंगे तो पुनः उठा नहीं पायेंगे. मुनि मान गये और गोवर्धन के साथ काशी को प्रस्थान किया. भगवद्इच्छानुसार जब वे ब्रज पहुंचे, गोवर्धन ने सोचा कि यही वह दिव्य धाम है जहां उन्हें रहना चाहिए. उनकी दिव्य शक्ति से पुलस्त्य मुनि लघुशंका का अनुभव करने लगे. बिना ध्यान दिये उन्होंने गोवर्धन को नीचे रखा और लघुशंका करने गये. वापस आने पर भरपूर बल प्रयोग करने के बाद भी वे गोर्वधन को तिलभर भी नहीं हिला पाये.

क्रोधवश पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को श्राप दिया कि उनका आकार प्रतिदिन राई के बीज के समान छोटा होता जायेगा. उस समय गोवर्धन का आकार 64 मील लम्बा, 40 मील चौड़ा और 16 मील ऊंचा था. कहा जाता है कि कलयुग के दस हजार वर्ष बीतने पर वह पूर्णरूपेण अदृश्य हो जायेगा.कथा बताने के पश्चात् उपानंद ने बताया कि जब तक गोवर्धन और यमुना नदी रहेंगे कलियुग अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पायेगा. उन्होंने यह भी कहा कि जो भी गोवर्धन प्राकट्य की यह कथा सुनेगा समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा।
(भगवद्दर्शन नवंबर/दिसंबर 2002 से साभार)

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