Monday, 2 January 2012

कल्पना भोग (ओशो)


किसी सुंदर युवती को देखकर जाने क्यों मन उसकी ओर आकर्षित होता है. मेरी उम्र पचास साल की हो गई है, फिर भी ऐसा क्यों होता है? मुझे क्या करना चाहिए, कृपया मार्ग-निर्दश करें।


जाग के अपने मन में दबी हुई वासनाओं का अन्तर्दर्शन करना होगा. अब मत दबाओ, कम-से-कम अब मत दबाओ.
अब तक दबाया उसका यह दुष्फल है, अब इस पर ध्यान करो. क्योंकी अब उम्र भी नहीं है कि तुम स्त्रियों के पीछे दौड़ो. वह बात जंचेगी नहीं.
अब, जो जीवन में नहीं हो रहा है उसे ध्यान में घटाओ. अब एक घंटा रोज आंख बंद कर के कल्पना को खुली छूट दो, वह किन्हीं पापों में ले जाये-जाने दो, तुम रोको मत, तुम साक्षी-भाव से उसे देखो कि यह मन जो-जो कर रहा है-मैं देखूं.
जो शरीर के द्वारा पूरी नहीं कर पाये वह मन के द्वारा पूरी हो जाने दो. तुम नियम से कामवासना के लिए एक घन्टा ध्यान में लगा दो. आंख बंद कर लो और जो-जो तुम्हारे मन में कल्पनायें उठती हैं, स्वप्न उठते हैं-जिनको तुम दबाते होगे निश्चित ही- उनको प्रकट होने दो.
घबराओ मत, क्योंकि तुम अकेले हो. किसी के साथ कोई पाप नहीं कर रहे हो. किसी को कोई चोट भी नहीं पहुंचा रहे हो.
किसी के साथ अभद्र व्यवहार भी नहीं कर रहे हो... कि किसी स्त्री को घूर के देख रहे हो. तुम अपनी कल्पना को ही घूर रहे हो.
लेकिन पूरी तरह घूरना और उसमें कंजूसी मत करना. मन बहुत कहेगा कि 'अरे इस उम्र में यह क्या कर रहे हो?' मन बहुत बार कहेगा कि यह तो पाप है. मन बहुत बार कहेगी कि शांत हो जाओ, कहां के विचारों में पड़े हो. मगर उस मन की मत सुनना- कहना, कि एक घन्टा तो दिया है इसी ध्यान के लिए, इस पर ही ध्यान करेंगे. औऱ एक घन्टा जितनी स्त्रियों को सुंदर बना सको बना लेना. इस एक घंटे में जितने 'कल्पना भोग' में डूब सको डूब जाना. और साथ-साथ पीछे खड़े देखते रहना कि मन क्या-क्या कर रहा है- बिना रोके, बिना निर्णय किये की पाप है, कि अपराध है. कुछ फिकर मत करना.
तो जल्दी ही, तीन-चार महीने के निरन्तर प्रयोग के बाद हल्के हो जाओगे, मन से धुआं निकल जायेगा. तब तुम अचानक पाओगे बाहर स्त्रियां हैं, लेकिन तुम्हारे मन में देखने की कोई आकांक्षा नहीं रह गयी, औऱ जब तुम्हारे मन में किसी को देखने की आकांक्षा नहीं रह जाती, तब लोगों का सौन्दर्य प्रकट होता है. वासना तो अंधा कर देती है, सौन्दर्य को देखने कहां देती है. वासना ने कभी सौन्दर्य जाना? वासना ने तो अपने ही सपने फैलाये! वासना दुष्पूर है, उसका कोई अन्त नहीं है.
तुम चकित होओगे, अगर तुमने एक-दो महीने भी इस प्रक्रिया को बिना किसी विरोध को भीतर उठाये, बिना अपराध-भाव के निश्चित मन से किया, तो तुम अचानक पाओगे धुएं की तरह कुछ बातें खो गयीं. महीने दो-महीने के बाद तुम पाओगे-तुम बैठे रहते हो घड़ी बीत जाती है, कोई कल्पना नहीं आती! कोई वासना नहीं उठती!
(जिन सूत्र- भाग 3)

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