
कीर्तन अवसर है-परमात्मा के प्रति अपने आनंद और अहोभाव को निवेदित करने का. उसकी कृपा से जो जीवन मिला, जो आनंद और चैत्नय मिला, उसके लिए परमात्मा के प्रति हमारे हृदय में जो प्रेम और धन्यवाद का भाव है, उसे हम कीर्तन में नाचकर, गाकर, उसके नाम-स्मरण की धुन में मस्ती में थिरककर अभिव्यक्त करते हैं. कीर्तन उत्सव है- भक्ति-भाव से भरे हुए हृदय का. व्यक्ति की भाव-उर्जा की समूह की भाव ऊर्जा में विसर्जित होने का अवसर है कीर्तन.
इस प्रयोग में शरीर पर कम और ढीले वस्त्रों का होना तथा पेट का खाली होना बहुत सहयोगी है.
कीर्तन ध्यान एक घन्टे का उत्सव है, जिसके पन्द्रह-पन्द्रह मिनट के चार चरण हैं.
सन्ध्या का समय इसके लिए सर्वोत्तम है.
पहला चरण
पहले चरण में कीर्तन-मण्डली संगीत के साथ एक धुन गाती है- जैसे 'गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि गोपाल बोलो.'
इस धुन को पुनः गाते हुए आप नृत्यमग्न हो जायें. धुन और संगीत पूरे भाव से डूबें और अपने शरीर और भावों को बना किसी सचेतन व्यवस्था के थिरकने तथा नाचने दें.
नृत्य और धुन की लयबद्धता में अपनी भाव-ऊर्जा को सघनता और गहराई की ओर विकसित करें.
दूसरा चरण
दूसरे चरण में धुन का गायन बंद हो जाता है, लेकिन संगीत और नृत्य जारी रहता है.
अब संगीत की तरंगों से एकरस होकर नृत्य जारी रखें. भावावेगों एवं आन्तरिक प्रेरणाओं को बच्चों की तरह निस्संकोच होकर पूरी तरह अभिव्यक्त होने दें.
तीसरा चरण
तीसरा चरण पूर्ण मौन और निष्क्रियता का है.
संगीत के बंद होते ही आप अचानक रुक जायें. समस्त क्रियायें बंद कर दें और विश्राम में डूब जायें. जाग्रत हुई भाव-ऊर्जा को भीतर-ही-भीतर काम करने दें.
चौथा चरण
चौथा चरण पूरे उत्सव की पूर्णाहुति का है.
पुनः शुरू हो गये मधुर संगीत के साथ आप अपने आनंद, अहोभाव और धन्यवाद के भाव को नाचकर पूरी तरह से अभिव्यक्त करें.
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