Monday, 2 January 2012

सन्तुलन ध्यान-1 (ओशो)


लाओत्से के साधना-सूत्रों में से एक गुप्त सूत्र जो उसकी किताबों में संल्लिखित नहीं हैय पर वह कानों-कान लाओत्से की परम्परा में चलता रहा है. वह साधना है- पालथी मारकर बैठ जायें और भीतर अनुभव करें कि एक तराजू बैलेन्स है- जिसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटकते हुए हैं. और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच-तीसरी आंख जहां समझी जाती है वहां स्थित है.

तराजू की डंडियां आपके मस्तिष्क में है और उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं.
लाओत्से कहते हैं कि अगर भीतर का तराजू साध लिया, तो सब सध जायेगा.

लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे. जब आप इस प्रयोग को करेंगे, तब आपको पता चलेगा कि जरा-सी सांस भी ली नहीं...कि एक पलड़ा नीचे हो जायेगा, दूसरा पलड़ा ऊपर हो जायेगा. अकेले बैठे हैं और एक आदमी बाहर निकल गया दरवाजे से- उसको देखकर- उसने कुछ किया भी नहीं है- लेकिन इतने में ही एक पलड़ा ऊपर और एक नीचे जायेगा.

लाओत्से ने कहा है कि भीतर चेतना को एक सन्तुलन दें. जीवन में सुख हो या दुख, सम्मान हो या अपमान, अन्धेरा हो या उजाला- भीतर के तराजू को साधते चले जायें. तो चेतना एक दिन उस परम सन्तुलन पर आ जाती है, जहां जीवन तो नहीं होता, अस्तित्व होता है, जहां लहरें नहीं होतीं, सागर होता है, जहां मैं नहीं होता, सब होता है.

सन्तुलन ध्यान-2

तिब्बत की छोटी सी विधी है- 'बैलेन्सिंग'- 'सन्तुलन' उस विधि का नाम है. कभी भी घर में खड़े हो जायें सुबह स्नान करके, दोनों पैर फैला लें और ख्याल करें.... आपके दायें पैर पर ज्यादा जोर पड़ रहा है कि बायें पैर पर ज्यादा जोर पड़ रहा है? अगर बायें पैर पर पड़ रहा है तो फिर आहिस्ते से जोर को दायें पैर पर ले जायें. दो क्षण दायें पैर पर जोर रखें, फिर बायें पैर पर ले जायें.

एक पन्द्रह दिन, सिर्फ शरीर का भार, बांयें पैर पर है कि दायें पर- इसको बदलते रहें. और यह तिब्बती प्रयोग कहता है कि फिर इस बात का प्रयोग करें कि दोनों पर भार न रह जाये.

यह तीन सप्ताह का प्रयोग है, और जब आप बिल्कुल बीच में होंगे- भार न बायें पर होगा, न दायें पर होगा- जब आप बिल्कुल बीच में होंगे- तब आप ध्यान में प्रवेश कर जायेंगे. ठीक उसी क्षण में आप ध्यान में चले जायेंगे.

ऊपर से देखने पर लगेगा, इतनी-सी आसान बात! करेंगे तो आसान भी मालूम पड़ेगी और कठिन भी. बहुत सरल मालूम पड़ती है, दो पंक्तियों में कही जा सकती है, लेकिन लाखों लोग इस छोटे-से प्रयोग के द्वारा परम आनन्द को उपलब्ध हुए हैं. जैसे ही आप बैलेन्सड होंते हैं- न बायें पर रह जाते, न दायें पर रह जाते- दोनों के बीच में रह जाते हैं, वैसे ही आप पाते हैं कि वह बैलेन्सिंग, सन्तुलन- आपकी कॉन्शिसनेस का, आपकी चेतना का भी हो गया, चेतना भी बैलेन्सड हो गयी, चेतनी भी संतुलित हो गयी.

और तब तत्काल तीर की तरह भीतर गति हो जाती है.

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