
अंग्रेजी का 'जिबरिश' शब्द 'जब्बार' नाम के एक सूफी सन्त से बना है. जब्बार अक्सर अनर्गल, अनाप-शनाप भाषा में बोला करता थे. वे इस भांति बोलते थे कि कोई समझ नहीं पाता था कि वे क्या बोल रहे हैं. इसलिए लोगों ने उनकी भाषा को 'जिबरिश' नाम दे दिया- जब्बार से जिबरिश.
ईसाइयों के एक मत में इस तरह के ध्यान को ग्लासोलेलिया कहते हैं; टाकिंग इन टंग्स.
अतः इस ध्यान प्रयोग में आपको जब्बार बन जाना है. यह एक घंटे का ध्यान है; बीस-बीस मिनट के तीन चरण हैं. सायं तीन से छह बजे के बीच इसे करें.
पहला चरण
खुले आकाश के नीचे विश्रामपूर्वक मुद्रा में लेट जायें और खुली आंख से आकाश में झांकें. किसी बिन्दु-विशेष पर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आकाश में.
दूसरा चरण
अब बैठ जायें, आंखें खुली रखें और आकाश के सामने जिबरिश में- यानी अर्थहीन, अनाप-शनाप बोलना शुरू करें. बीस मिनट के लिए 'जब्बार-जैसे' बन जायें- जो भी मन में आये, बोलें. चीखें, चिंघाड़ें, किलकारियां मारें, ठहाके लगायें- कुछ भी.
लेकिन इसे सार्थक बनाने के कोशिश न करें. क्योंकि तब इसका कोई अर्थ नहीं रह जायेगा; तब सब व्यर्थ हो जायेगा. ध्यान रहे, आप किसी व्यक्ति से नहीं, बृहत् आकाश से बोल रहे हैं. और आकाश कुछ भी नहीं समझता. भाषा इसमें सहयोगी नहीं है. भाषा से मन का कभी अतिक्रमण नहीं होता. आकाश के सामने, आकाश के समक्ष ऊल-जलूल बात करने से मन तत्काल गिर जाता है; उसकी जरूरत ही नहीं रह जाती है. लेकिन मन कहेगा- यह क्या कर रहे हो? पागल हो गये हो? पर मन की न सुनें. उसे कह दें- जरा प्रतिक्षा करो, जो मैं करता हूं, मुझे करने दो. बस बीस मिनट इसका खूब मजा लें.
तीसरा चरण
शांत हो जायें, आंख बन्द कर लें और विश्राम में चले जायें. अब भीतर के आकाश में- अन्तर्आकाश में झांकें. बीस मिनट अनाप-शनाप बक चुकने पर आप अपने को इतना शांत और आकाशवत् महसूस करेंगे कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि आपके भीतर इतना बड़ा आकाश है. लेकिन, इसे अकेले करें.
जिबरिश कैसे बोलें links: http://www.youtube.com/watch?v=k3UL_Qtd-fM
http://www.youtube.com/watch?v=dWtBFPc5How&feature=related



