Tuesday, 3 January 2012

जिबरिश


अंग्रेजी का 'जिबरिश' शब्द 'जब्बार' नाम के एक सूफी सन्त से बना है. जब्बार अक्सर अनर्गल, अनाप-शनाप भाषा में बोला करता थे. वे इस भांति बोलते थे कि कोई समझ नहीं पाता था कि वे क्या बोल रहे हैं. इसलिए लोगों ने उनकी भाषा को 'जिबरिश' नाम दे दिया- जब्बार से जिबरिश.

ईसाइयों के एक मत में इस तरह के ध्यान को ग्लासोलेलिया कहते हैं; टाकिंग इन टंग्स.

अतः इस ध्यान प्रयोग में आपको जब्बार बन जाना है. यह एक घंटे का ध्यान है; बीस-बीस मिनट के तीन चरण हैं. सायं तीन से छह बजे के बीच इसे करें.

पहला चरण
खुले आकाश के नीचे विश्रामपूर्वक मुद्रा में लेट जायें और खुली आंख से आकाश में झांकें. किसी बिन्दु-विशेष पर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आकाश में.

दूसरा चरण
अब बैठ जायें, आंखें खुली रखें और आकाश के सामने जिबरिश में- यानी अर्थहीन, अनाप-शनाप बोलना शुरू करें. बीस मिनट के लिए 'जब्बार-जैसे' बन जायें- जो भी मन में आये, बोलें. चीखें, चिंघाड़ें, किलकारियां मारें, ठहाके लगायें- कुछ भी.

लेकिन इसे सार्थक बनाने के कोशिश न करें. क्योंकि तब इसका कोई अर्थ नहीं रह जायेगा; तब सब व्यर्थ हो जायेगा. ध्यान रहे, आप किसी व्यक्ति से नहीं, बृहत् आकाश से बोल रहे हैं. और आकाश कुछ भी नहीं समझता. भाषा इसमें सहयोगी नहीं है. भाषा से मन का कभी अतिक्रमण नहीं होता. आकाश के सामने, आकाश के समक्ष ऊल-जलूल बात करने से मन तत्काल गिर जाता है; उसकी जरूरत ही नहीं रह जाती है. लेकिन मन कहेगा- यह क्या कर रहे हो? पागल हो गये हो? पर मन की न सुनें. उसे कह दें- जरा प्रतिक्षा करो, जो मैं करता हूं, मुझे करने दो. बस बीस मिनट इसका खूब मजा लें.

तीसरा चरण
शांत हो जायें, आंख बन्द कर लें और विश्राम में चले जायें. अब भीतर के आकाश में- अन्तर्आकाश में झांकें. बीस मिनट अनाप-शनाप बक चुकने पर आप अपने को इतना शांत और आकाशवत् महसूस करेंगे कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि आपके भीतर इतना बड़ा आकाश है. लेकिन, इसे अकेले करें.

जिबरिश कैसे बोलें links: http://www.youtube.com/watch?v=k3UL_Qtd-fM
http://www.youtube.com/watch?v=dWtBFPc5How&feature=related

रात्रि-ध्यान


रात्रि, सोने से पूर्व, बिस्तर पर लेट जायें, कमरे में अंधेरा कर लें, और आंख बन्द कर के जोर से श्वास मुंह से बाहर निकालें.

निकालने से शुरू करें- एग्जेहलेशन, लेने से नहीं, निकालने से. जोर से श्वास मुंह से बाहर निकालें, और निकालते समय 'ओssssss' की ध्वनि करें. जैसे-जैसे ध्वनि साफ होने लगेगी, 'ओम्' अपने-आप निर्मित हो जायेगा; आप सिर्फ ओssssss का उच्चार करें. ओम् का आखिरी हिस्सा, अपने-आप जैसे ध्वनि व्यवस्थित होगी- आने लगेगा.

आपको 'ओम्' कहना है- 'म्' को आने देना है. पूरी श्वास बाहर फेंक दें, फिर होंठ बन्द कर लें और शरीर को श्वास लेने दें. आप मत लें. निकालना आप को है, लेना शरीर को है, लेने का काम शरीर कर लेगा. श्वास रोकनी नहीं है. लेते समय आप को कुछ भी नहीं करना है- न लेना है, न रोकना है- बस छोड़ना है.

तो दस मिनट तक ओssssss की आवाज के साथ श्वास को छोड़ें- मुंह से, फिर नाक से श्वास लें, फिर मुंह से छोड़ें फिर नाक से लें....और ऐसे ओsss की आवाज करते-करते से जायें. इससे निद्रा गहरी और स्वप्नहीन हो जायेगी तथा सुबह उठने पर एक अपूर्व ताजगी का अनुभव होगा.

Monday, 2 January 2012

सन्तुलन ध्यान-1 (ओशो)


लाओत्से के साधना-सूत्रों में से एक गुप्त सूत्र जो उसकी किताबों में संल्लिखित नहीं हैय पर वह कानों-कान लाओत्से की परम्परा में चलता रहा है. वह साधना है- पालथी मारकर बैठ जायें और भीतर अनुभव करें कि एक तराजू बैलेन्स है- जिसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटकते हुए हैं. और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच-तीसरी आंख जहां समझी जाती है वहां स्थित है.

तराजू की डंडियां आपके मस्तिष्क में है और उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं.
लाओत्से कहते हैं कि अगर भीतर का तराजू साध लिया, तो सब सध जायेगा.

लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे. जब आप इस प्रयोग को करेंगे, तब आपको पता चलेगा कि जरा-सी सांस भी ली नहीं...कि एक पलड़ा नीचे हो जायेगा, दूसरा पलड़ा ऊपर हो जायेगा. अकेले बैठे हैं और एक आदमी बाहर निकल गया दरवाजे से- उसको देखकर- उसने कुछ किया भी नहीं है- लेकिन इतने में ही एक पलड़ा ऊपर और एक नीचे जायेगा.

लाओत्से ने कहा है कि भीतर चेतना को एक सन्तुलन दें. जीवन में सुख हो या दुख, सम्मान हो या अपमान, अन्धेरा हो या उजाला- भीतर के तराजू को साधते चले जायें. तो चेतना एक दिन उस परम सन्तुलन पर आ जाती है, जहां जीवन तो नहीं होता, अस्तित्व होता है, जहां लहरें नहीं होतीं, सागर होता है, जहां मैं नहीं होता, सब होता है.

सन्तुलन ध्यान-2

तिब्बत की छोटी सी विधी है- 'बैलेन्सिंग'- 'सन्तुलन' उस विधि का नाम है. कभी भी घर में खड़े हो जायें सुबह स्नान करके, दोनों पैर फैला लें और ख्याल करें.... आपके दायें पैर पर ज्यादा जोर पड़ रहा है कि बायें पैर पर ज्यादा जोर पड़ रहा है? अगर बायें पैर पर पड़ रहा है तो फिर आहिस्ते से जोर को दायें पैर पर ले जायें. दो क्षण दायें पैर पर जोर रखें, फिर बायें पैर पर ले जायें.

एक पन्द्रह दिन, सिर्फ शरीर का भार, बांयें पैर पर है कि दायें पर- इसको बदलते रहें. और यह तिब्बती प्रयोग कहता है कि फिर इस बात का प्रयोग करें कि दोनों पर भार न रह जाये.

यह तीन सप्ताह का प्रयोग है, और जब आप बिल्कुल बीच में होंगे- भार न बायें पर होगा, न दायें पर होगा- जब आप बिल्कुल बीच में होंगे- तब आप ध्यान में प्रवेश कर जायेंगे. ठीक उसी क्षण में आप ध्यान में चले जायेंगे.

ऊपर से देखने पर लगेगा, इतनी-सी आसान बात! करेंगे तो आसान भी मालूम पड़ेगी और कठिन भी. बहुत सरल मालूम पड़ती है, दो पंक्तियों में कही जा सकती है, लेकिन लाखों लोग इस छोटे-से प्रयोग के द्वारा परम आनन्द को उपलब्ध हुए हैं. जैसे ही आप बैलेन्सड होंते हैं- न बायें पर रह जाते, न दायें पर रह जाते- दोनों के बीच में रह जाते हैं, वैसे ही आप पाते हैं कि वह बैलेन्सिंग, सन्तुलन- आपकी कॉन्शिसनेस का, आपकी चेतना का भी हो गया, चेतना भी बैलेन्सड हो गयी, चेतनी भी संतुलित हो गयी.

और तब तत्काल तीर की तरह भीतर गति हो जाती है.

कीर्तन ध्यान (ओशो)


कीर्तन अवसर है-परमात्मा के प्रति अपने आनंद और अहोभाव को निवेदित करने का. उसकी कृपा से जो जीवन मिला, जो आनंद और चैत्नय मिला, उसके लिए परमात्मा के प्रति हमारे हृदय में जो प्रेम और धन्यवाद का भाव है, उसे हम कीर्तन में नाचकर, गाकर, उसके नाम-स्मरण की धुन में मस्ती में थिरककर अभिव्यक्त करते हैं. कीर्तन उत्सव है- भक्ति-भाव से भरे हुए हृदय का. व्यक्ति की भाव-उर्जा की समूह की भाव ऊर्जा में विसर्जित होने का अवसर है कीर्तन.
इस प्रयोग में शरीर पर कम और ढीले वस्त्रों का होना तथा पेट का खाली होना बहुत सहयोगी है.
कीर्तन ध्यान एक घन्टे का उत्सव है, जिसके पन्द्रह-पन्द्रह मिनट के चार चरण हैं.
सन्ध्या का समय इसके लिए सर्वोत्तम है.

पहला चरण
पहले चरण में कीर्तन-मण्डली संगीत के साथ एक धुन गाती है- जैसे 'गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि गोपाल बोलो.'
इस धुन को पुनः गाते हुए आप नृत्यमग्न हो जायें. धुन और संगीत पूरे भाव से डूबें और अपने शरीर और भावों को बना किसी सचेतन व्यवस्था के थिरकने तथा नाचने दें.
नृत्य और धुन की लयबद्धता में अपनी भाव-ऊर्जा को सघनता और गहराई की ओर विकसित करें.

दूसरा चरण
दूसरे चरण में धुन का गायन बंद हो जाता है, लेकिन संगीत और नृत्य जारी रहता है.
अब संगीत की तरंगों से एकरस होकर नृत्य जारी रखें. भावावेगों एवं आन्तरिक प्रेरणाओं को बच्चों की तरह निस्संकोच होकर पूरी तरह अभिव्यक्त होने दें.

तीसरा चरण
तीसरा चरण पूर्ण मौन और निष्क्रियता का है.
संगीत के बंद होते ही आप अचानक रुक जायें. समस्त क्रियायें बंद कर दें और विश्राम में डूब जायें. जाग्रत हुई भाव-ऊर्जा को भीतर-ही-भीतर काम करने दें.

चौथा चरण
चौथा चरण पूरे उत्सव की पूर्णाहुति का है.
पुनः शुरू हो गये मधुर संगीत के साथ आप अपने आनंद, अहोभाव और धन्यवाद के भाव को नाचकर पूरी तरह से अभिव्यक्त करें.

कल्पना भोग (ओशो)


किसी सुंदर युवती को देखकर जाने क्यों मन उसकी ओर आकर्षित होता है. मेरी उम्र पचास साल की हो गई है, फिर भी ऐसा क्यों होता है? मुझे क्या करना चाहिए, कृपया मार्ग-निर्दश करें।


जाग के अपने मन में दबी हुई वासनाओं का अन्तर्दर्शन करना होगा. अब मत दबाओ, कम-से-कम अब मत दबाओ.
अब तक दबाया उसका यह दुष्फल है, अब इस पर ध्यान करो. क्योंकी अब उम्र भी नहीं है कि तुम स्त्रियों के पीछे दौड़ो. वह बात जंचेगी नहीं.
अब, जो जीवन में नहीं हो रहा है उसे ध्यान में घटाओ. अब एक घंटा रोज आंख बंद कर के कल्पना को खुली छूट दो, वह किन्हीं पापों में ले जाये-जाने दो, तुम रोको मत, तुम साक्षी-भाव से उसे देखो कि यह मन जो-जो कर रहा है-मैं देखूं.
जो शरीर के द्वारा पूरी नहीं कर पाये वह मन के द्वारा पूरी हो जाने दो. तुम नियम से कामवासना के लिए एक घन्टा ध्यान में लगा दो. आंख बंद कर लो और जो-जो तुम्हारे मन में कल्पनायें उठती हैं, स्वप्न उठते हैं-जिनको तुम दबाते होगे निश्चित ही- उनको प्रकट होने दो.
घबराओ मत, क्योंकि तुम अकेले हो. किसी के साथ कोई पाप नहीं कर रहे हो. किसी को कोई चोट भी नहीं पहुंचा रहे हो.
किसी के साथ अभद्र व्यवहार भी नहीं कर रहे हो... कि किसी स्त्री को घूर के देख रहे हो. तुम अपनी कल्पना को ही घूर रहे हो.
लेकिन पूरी तरह घूरना और उसमें कंजूसी मत करना. मन बहुत कहेगा कि 'अरे इस उम्र में यह क्या कर रहे हो?' मन बहुत बार कहेगा कि यह तो पाप है. मन बहुत बार कहेगी कि शांत हो जाओ, कहां के विचारों में पड़े हो. मगर उस मन की मत सुनना- कहना, कि एक घन्टा तो दिया है इसी ध्यान के लिए, इस पर ही ध्यान करेंगे. औऱ एक घन्टा जितनी स्त्रियों को सुंदर बना सको बना लेना. इस एक घंटे में जितने 'कल्पना भोग' में डूब सको डूब जाना. और साथ-साथ पीछे खड़े देखते रहना कि मन क्या-क्या कर रहा है- बिना रोके, बिना निर्णय किये की पाप है, कि अपराध है. कुछ फिकर मत करना.
तो जल्दी ही, तीन-चार महीने के निरन्तर प्रयोग के बाद हल्के हो जाओगे, मन से धुआं निकल जायेगा. तब तुम अचानक पाओगे बाहर स्त्रियां हैं, लेकिन तुम्हारे मन में देखने की कोई आकांक्षा नहीं रह गयी, औऱ जब तुम्हारे मन में किसी को देखने की आकांक्षा नहीं रह जाती, तब लोगों का सौन्दर्य प्रकट होता है. वासना तो अंधा कर देती है, सौन्दर्य को देखने कहां देती है. वासना ने कभी सौन्दर्य जाना? वासना ने तो अपने ही सपने फैलाये! वासना दुष्पूर है, उसका कोई अन्त नहीं है.
तुम चकित होओगे, अगर तुमने एक-दो महीने भी इस प्रक्रिया को बिना किसी विरोध को भीतर उठाये, बिना अपराध-भाव के निश्चित मन से किया, तो तुम अचानक पाओगे धुएं की तरह कुछ बातें खो गयीं. महीने दो-महीने के बाद तुम पाओगे-तुम बैठे रहते हो घड़ी बीत जाती है, कोई कल्पना नहीं आती! कोई वासना नहीं उठती!
(जिन सूत्र- भाग 3)