Wednesday, 26 October 2011

ध्यान की एक सौ बारह विधियां: ओशो


कुछ भूमिका की बातें।एक कि विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है; वह दार्शनिक नहीं है। सिद्धांत इसके लिए अर्थ नहीं रखता। यह उपाय की, विधि की चिंता नहीं करता है, सिद्धांत कि कतई नहीं। तंत्र शब्द का अर्थ ही है विधि, उपाय, मार्ग। इसलिए यह कोई मीमांसा नहीं है, इस बात को ध्यान में रख लें।

बौद्धिक समस्याओं औऱ उनके उहापोह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह चीजों के बारे में 'क्यों' की चिंता नहीं लेता, उनके 'कैसे' की चिंता कर लेता है; सत्य क्या है इसकी नहीं, वरन इसकी की सत्य को कैसे उपलब्ध हुआ जाए।तंत्र का अर्थ विधि है। इसलिए यह एक विज्ञान-ग्रंथ है। विज्ञान 'क्यों' की नहीं, 'कैसे' की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता हैः अस्तित्व क्यों है? विज्ञान पूछता हैः यह अस्तित्व कैसे है?

जब तुम कैसे का प्रश्न पूछते हो, तब उपाय, विधि महत्वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्यर्थ हो जाते हैं; अनुभव केंद्र बन जाता है।तंत्र विज्ञान है; तंत्र दर्शन नहीं है। दर्शन को समझना आसान है; क्योंकि उसके लिए सिर्फ मस्तिष्क की जरूरत पड़ती है। यदि तुम भाषा जानते हो, यदि तुम प्रत्यय समझते हो तो तुम दर्शन समझ सकते हो। उसके लिए तुम्हें बदलने की, संपरिवर्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। तुम जैसे हो वैसे ही बने रहकर दर्शन को समझ सकते हो। लेकिन वैसे ही रहकर तंत्र को नहीं समझ सकते ।

तंत्र को समझने के लिए तुम्हारे बदलने की जरूरत रहेगी; बदलाहट की ही नहीं, आमूल बदलाहट की जरूरत होगी। जब तक तुम बिल्कुल भिन्न नहीं हो जाते हो, तब तक तंत्र को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि तंत्र कोई बौद्धिक प्रस्तावना नहीं है; वह एक अनुभव है। और जब तक तुम अनुभव के प्रति संवेदनशील, तैयार, खुले हुए नहीं होते, तब तक यह अनुभव तुम्हारे पास आने को नहीं है।दर्शन की फिक्र तुम्हारे मन के साथ है। उसके लिए तुम्हारा मस्तिष्क काफी है, उसको तुम्हारी समग्रता नहीं चाहिए।

तंत्र तुमको तुम्हारी समग्रता में मांगता है। यह बहुत गहरी चुनौती है; इसमें तुम पूरे और इकट्ठे होकर ही उतर सकते हो। तंत्र खंडित नहीं है। उसकी अगवानी के लिए और ही तरह के रुझान, और ही तरह की यात्रा, और ही तरह के मन की जरूरत है।यही कारण है कि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक प्रश्न जैसे दिखते हैं। विज्ञान भैरव तंत्र देवी के प्रश्नों से शुरू होता है। तंत्र गैर-दार्शनिक है और अस्तित्वगत है। इसलिए यद्यपि देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं जो दार्शनिक मालूम होते हैं, लेकिन शिव उत्तर उसी ढंग से नहीं देते। इस बात को आरंभ में ही समझ लेना बेहतर होगा। नहीं तो तुम हैरानी में पड़ोगे कि शिव क्यों उनके एक प्रश्न का भी उत्तर नहीं देते। जो भी प्रश्न देवी पूछती हैं, शिव उनके उत्तर ही नहीं देते। औऱ तो भी वे उत्तर देते हैं। और सच तो यह है कि केवल शिव ने ही उनके उत्तर दिए हैं, किसी औऱ ने नहीं। लेकिन उनके उत्तर भिन्न तल के हैं।देवी पूछती हैं:प्रभो आपका सत्य क्या है?

शिव इस प्रश्न का उत्तर न देकर उसके बदले में एक विधि देते हैं। अगर देवी इस विधि के प्रयोग से गुजर जाएं तो वे उत्तर पा जाएंगी। इसलिए उत्तर परोक्ष है, प्रत्यक्ष नहीं। शिव नहीं बताते हैं कि मैं कौन हूं, वे एक विधि भर बताते हैं। वे कहते हैं: यह करो और तुम जान जाओगी।ये एक सौ बारह विधियां सभी लोगों के काम आ सकती हैं। हो सकता है, कोई विशेष उपाय तुमको ठीक न पड़े। इसलिए तो शिव अनेक उपाय बताते चले जाते हैं। कोई एक विधि चुन लो जो तुमको जंच जाए। और यह जानना कठिन नहीं है कि कौन सी विधि तुम्हें जंचती है।

हम यहां प्रत्येक विधि को समझने की कोशिश करेंगे और बताएंगे कि कैसे तुम अपने लिए वही विधि चुन लो जो कि तुम्हें और तुम्हारे मन को रूपांतरित कर दे। यह समझ, यह बौद्धिक समझ बुनियादी तौर से जरूरी है, लेकिन यह अंत नहीं है। जिस विधि की भी चर्चा मैं यहां करूं उसको प्रयोग करो। सच में यह है कि जब तुम अपनी सही विधि का प्रयोग करते हो तब झट से उसका तार तुम्हारे किसी तार से लगकर बज उठता है।इसलिए मैं यहां रोज-रोज विधियों की चर्चा किए जाऊंगा। तुम प्रयोग करना। बस उनसे खेलना। घर जाना और प्रयोग करना। और प्रयोग करते-करते जब तुम अपनी विधि के पास पहुंचोगे तो वह तुम्हारे भीतर खट से बज उठेगी, वह तुम्हें घेर लेगी। तुम्हारे भीतर कुछ विस्फोट सा होगा और तुम जानोगे कि यह विधि मेरे लिए है।

लेकिन प्रयास जरूरी है। और तुम चकित रह जाओगे कि किसी दिन एक विधि ने तुम्हें बस आच्छादित कर लिया है।इसलिए इधर मैं उनकी चर्चा किए जाऊंगा और उधर साथ ही साथ तुम उनके साथ खेलते जाना। मैं खेलना शब्द का व्यवहार करता हूं, क्योंकि तुम्हें बहुत गंभीर नहीं होना है। बस खेलना। और खेल-खेल में ही तुम्हें कुछ जंच जाएगा। जब जंच जाए तब गंभीर हो जाना, तब उसमें गहरे उतर जाना-तीव्रता से, निष्ठा से, पूरी ऊर्जा के साथ, पूरे मन से। लेकिन उसके पहले बस खेलना।मैंने देखा है कि जब तुम खेलते हो तो तुम्हारा मन अधिक खुला रहता है।

गंभीर होने पर वह उतना खुला नहीं होता, बंद होता है। इसलिए खेलना भर। गंभीर नहीं होना, खेलना। और ये विधियां बहुत सरल हैं। तुम उनके साथ खेल सकते हो।एक विधि लो और उसके साथ तन दिन खेलो। अगर तुम्हें उसके साथ निकटता की अनुभूति हो, अगर उसके साथ तुम थोड़ा स्वस्थ महसूस करो, अगर तुम्हें लगे कि यह तुम्हारे लिए है तो फिर उसके प्रति गंभीर हो जाओ। तब दूसरी विधियों को भूल जाओ, उनसे खेलना बंद करो। औऱ अपनी विधि के साथ टिको, कम से कम तीन महीने टिको। चमत्कार संभव है।

बस इतना होना चाहिए कि वह विधि सचमुच तुम्हारे लिए हो। यदि तुम्हारे लिए नहीं है तो कुछ नहीं होगा। और अगर विधि तुम्हारे लिए है तो तीन मिनट काफी हैं।ये एक सौ बारह विधियां तुम्हारे लिए चमत्कारिक अनुभव बन सकती हैं, या तुम उन्हें महज सुन सकते हो। यह तुम पर निर्भर है, मैं सभी संभव पहलुओं से विधि की व्याख्या करूंगा। अगर तुम उसके साथ कुछ निकटता अनुभव करो तो तीन दिनों तक उससे खेलो और फिर तीन महीने उसके साथ प्रयोग करो।

जीवन चमत्कार है। अगर हमने उसके रहस्य को नहीं जाना हैतो उससे यही जाहिर होता है कि तुम्हें उसके पास पहुंचने की विधि नहीं मालूम है।शिव यहां एक सौ बारह विधियां प्रस्तावित कर रहे हैं। इसमें सभी संभव विधियों सम्मिलित हैं। यदि इनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर नहीं 'जंचती' है, कोई भी तुम्हें यह भाव नहीं देती है कि वह तुम्हारे लिए है तो फिर कोई भी विधि तुम्हारे लिए नहीं बची। इसे ध्यान में रखो। तब आध्यात्म को भूल जाओ और खुश रहो। वह तब तुम्हारे लिए नहीं है।लेकिन ये एक सौ बारह विधियां तो समस्त मानव-जाति के लिए हैं। और वे उन सभी युगों के लिए हैं जो गुजर गए हैं औऱ आने वाले हैं। और किसी भी युग में एक भी आदमी नहीं हुआ और न होने वाला ही है, जो कह सके कि ये सभी एक सौ बारह विधियां मेरे लिए व्यर्थ हैं। असंभव! यह असंभव है!

प्रत्येक ढंग के चित्त के लिए यहां गुंजाइश है। तंत्र में प्रत्येक किस्म के चित्त के लिए विधि है। कई विधियां हैं जिनके उपयुक्त मनुष्य अभी उपलब्ध नहीं हैं, वे भविष्य के लिए हैं। और ऐसी विधियां भी हैं जिनके उपयुक्त लोग रहे नहीं, वे अतीत के लिए हैं। लेकिन डर मत जाना। अनेक विधियां हैं जो तुम्हारे लिए ही हैं।

तंत्र-सूत्र 1 प्रवचन 1(संस्करणः 1993) (ओशो टाइम्स, अंक फरवरी 2000)

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