
मेरे मन में इधर बहुत दिनों से एक बात निरंतर ख्याल में आती है और वह है कि सारी दुनिया से आने वाले दिनों में संन्यासी के समाप्त हो जाने की संभावना है। संन्यासी आने वाले पचास वर्षों के बाद पृथ्वी पर नहीं बच सकेगा। वह संस्था विलीन हो जाएगी। उस संस्था के नीचे की ईंट तो खिसका ही दी गई हैं, उसका मकान भी गिर जाएगा। लेकिन संन्यास इतनी बहुमूल्य चीज है कि जिस दिन दुनिया से विलीन हो जाएगी उस दिन दुनिया का बहुत अहित हो जाएगा।मेरे देखे, संन्यासी तो चला जाना चाहिए, संन्यास बच जाना चाहिए। और उसके लिए पीरियाडिकल संन्यास का, पीरियाडिकल रिनन्सिएशन का मेरे मन में ख्याल है।
वर्ष में, ऐसा कोई आदमी नहीं होना चाहिए, जो एकाध महीने के लिए संन्यास न ले ले। जीवन में तो कोई भी ऐसा आदमी नहीं होना चाहिए जो दो-चार बार संन्यासी न हो गया हो।स्थायी संन्यास खतरनाक सिद्ध होता है, कि कोई आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी हो जाए। उसके दो खतरे हैं. एक खतरा तो यह है कि वह आदमी जीवन से दूर हट जाता है। और परमात्मा की, प्रेम की, या आनंद की जोभी उपलब्धियां हैं, वे जीवन के घनीभूत अनूभव में हैं, जीवन के बाहर नहीं। दूसरी बात यह होती है कि जो आदमी जीवन से हट जाता है, उसकी जो शांति, उसका जो आनंद है, वह जीवन में बिखरने से बच जाता है, जीवन उसका साझीदार नहीं हो पाता। तीसरी बात यह है, लोगों को यह ख्याल पैदा हो जाता है कि गृहस्थ अलग है और संन्यासी अलग है। तो गलत काम करते वक्त भी हमें यह ख्याल रहता है कि हम तो गृहस्थ हैं, यह तो करना हमारी मजबूरी है, संन्यासी हो जाएंगे तो हम नहीं करेंगे। तो धर्म और जीवन के बीच एक फासला पैदा हो जाता है।
मेरी दृष्टि में, संन्यास जीवन का अंग होना चाहिए। संन्यास जीवन को समझने औऱ पहचानने की विधि होनी चाहिए। ऐसे आदमी का जीवन अधूरा औऱ अधूरी शिक्षा माननी चाहिए उसकी, जो आदमी वर्ष में थोड़े दिनों के लिए संन्यासी न हो जाता हो। अगर बारह महीने में एक महीने या दो महीने कोई व्यक्ति परिपुर्ण संन्यासी का जीवन जीता हो तो उसके जीवन में आनंद के इतने द्वार खुल जाएंगे जिसकी उसे कल्पना भी नहीं हो सकती। इन दो महीनों में दुनिया से उसका संबंध नहीं है। संन्यासी का भी जितना संबंध होता है दुनिया से उतना भी उसका दो महीने में संबंध नहीं है।और यह जान कर आपको हैरानी होगी, जो आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी हो जाता है वह गृहस्थियों के ऊपर निर्भर हो जाता है। इसलिए वह दिखता तो है कि संसार से दूर गया, लेकिन संसार के पास उसे रहना पड़ता है।
लेकिन जो आदमी बारह महीने में दो महीने संन्यासी होता है वह किसी के ऊपर निर्भर नहीं होता, वह अपने ही दस महीने का जो गृहस्थ जीवन था उस पर निर्भर होता है। वह संसार के ऊपर आश्रित नहीं होता। इसलिए किसी से भयभीत भी नहीं होता, किसी से संबंधित भी नहीं होता।अगर एक आदमी पूरे जीवन के लिए संन्यासी होगा तो वह किसी का आश्रित होगा ही; वह बच नहीं सकेगा। और अंतिम परिणाम यह होता है कि संन्यासी दिखाई तो पड़ते हैं कि हमारे नेता हैं, लेकिन वे अनुयायियों के लिए भी अनुयायी हो जाते हैं। वे उनके भी पीछे चलते हैं। संन्यासियों को आज्ञा देते हैं गृहस्थ कि तुम ऐसा करो और वैसा मत करो। गृहस्थ उनका मालिक हो जाता है, क्योंकि उनको रोटी देता है।संन्यासी गुलाम हो जाता है।
संन्यासी की गुलामी टूट सकती है एक ही रास्ते से कि आदमी कभी-कभी संन्यासी हो। तब वह किसी पर निर्भर नहीं है। वह अपनी ग्यारह महीने की कमाई पर निर्भर है। किसी से उसको लेना-देना नहीं है।और यह एक महीने वह पूरी फ्रीडम, पूरी स्वतंत्रता का उपयोग कर सकता है, बिना किसी आश्रय के। तो यह एक महीने में वह परिपूर्ण संन्यास का अनुभव करेगा जो कि कोई संन्यासी कभी नहीं कर पाता है। तब वह पूर्ण रूप से जी सकता है।और यह एक महीने में जिस विधि से वह जीएगा और जिस आनंद को, जिस शांति को अनुभव करेगा, और जिस स्वतंत्रता में प्रवेश करेगा- वापस लौट जाएगा एक महीने के बाद जिंदगी में। वापस लौट जाएगा और जिंदगी के घनेपन में प्रयोग करेगा कि जो उसने एकांत में सीखा था, क्या भीड़ में उसका उपयोग कर सकता है?क्योंकि एकांत में शिक्षा होती है, भीड़ में परीक्षा होती है। जो भीड़ से बच जाता है। उसकी शिक्षा अधूरी रह जाती है।
जो मैंने अकेले में जाना है, अगर भीड़ में मैं उसका उपयोग नहीं कर सकता हूं तो वह जानना गलत है। वह बहुत मूल्य का नहीं है। वहां कसौटी है, क्योंकि वहां विरोध है, वहां परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, वहां प्रतिकूल हैं। वहां भी मैं शांत रह सकता हूं या नहीं? वहां भी मैं अपने भीतर जिस संन्यास को मैंने एक महीने साधा है और जो आनंद पाया है, क्या मैं घर के भीतर, दुकान पर बैठ कर भी उस संन्यास को साध सकता हूं या नहीं?यह ग्यारह महीना उसे निरीक्षण करना है, आब्जर्व करना है। वर्ष भर बाद उसे फिर महीने भर के लिए लौट आना है। ताकि वह फिर जो वर्ष भर में उसने अनुभव किया है परीक्षा से गुजर कर, उसे और गहरा कर सके। पिछले वर्ष जहां गया था, और नयी सीढ़ियां पार कर सके।
अगर एक आदमी बीस साल की उम्र के बाद सत्तर साल तक जीए और पचास वर्षों में पचास महीने के लिए संन्यासी हो जाए-इस जगत में ऐसा कोई सत्य नहीं है जिससे वह अपरिचित रह जाए, ऐसी कोई अनुभूति नहीं है जिससे वह अनजाना रह जाए।और यह जो रिनन्सिएशन होगा पीरियाडिकल, यह जो एक अवधि के लिए लिया गया संन्यास होगा, यह उसे जीवन से नहीं तोड़ेगा।अन्यथा हमारा संन्यासी जो है वह जीवन-विरोधी हो गया। पत्नी और बच्चे उससे भयभीत हैं, मां-बाप उससे भयभीत हैं, क्योंकि वह तो जीवन को उजाड़ कर चला जाएगा।
यह जो कभी-कभी संन्यासी होता है, इससे जीवन को भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं। बल्कि जब यह लौटेगा तो इसकी पत्नी पाएगी कि और भी ज्यादा प्यारा पति होकर लौटा है। उसके बच्चे पाएंगे, वह ज्यादा बेहतर बाप होकर लौटा है। उसकी मां पाएगी कि वह ज्यादा श्रद्धा, ज्यादा प्रेम से, आदर से भरा हुआ बेटा होकर लौटा है।और तब इस एक महीने के बाद जो वह ग्यारह महीने घर में जीएगा और जो सुगंध उसने पाई है वह बिखरेगी उसके संबंधों में, तो वह दुनिया को बनाएगा।
अब तक संन्यासी ने दुनिया को उजाड़ा है और बिगाड़ा है, उसको बनाया नहीं है। वह जीवन को निर्मित करने में, सृजन करने में सहयोगी और मित्र हो जाएगा।तो मेरे मन में, एक अवधि के लिए संन्यास अनिवार्य है, वह मेरे ख्याल में है। इस भांति संन्यासी तो दुनिया से समाप्त हो जाए तो फिर कोई डर नहीं है, संन्यास बचा रहेगा। और इस भांति जो संन्यास व्यापक रूप से डिफ्यूज हो जाएगा बड़े पैमाने पर, क्योंकि हर आदमी को हक हो जाएगा फिर संन्यासी होने का-अभी हर आदमी को हक नहीं हो सकता। क्योंकि अभी हर आदमी संन्यासी हो जाए तो जीवन एक मरघट बन जाए, मृत्यु बन जाए।और जो काम हर आदमी न कर सकता हो, उस काम में कोई भूल है। जो काम हर आदमी का अधिकार न बन सकता हो, उसमें कोई भूल है।अगर सारे लोग संन्यासी हो जाएं तो जीवन आज उजड़ जाए, इसी क्षण, तो जो संन्यासी भी हैं उनको भी वापस लौट आना पड़े। तो यह जो आजीवन संन्यास है यह भ्रांत है, यह गलत है। ऐसा संन्यास बच सके दुनिया में, उसके लिए एक बड़ा गहरा प्रयोग करना जरूरी है।
अनंत की पुकार प्रवचन 5 से संकलित
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