Tuesday, 18 October 2011

कैसे आए समृद्धि- ओशो


हमारी जरूरतें जितनी कम होंगी, उतनी जल्दी हम समृद्ध हो जाते हैं. जरूरतें ज्यादा हों, तो उतनी ही देर लगती है समृद्ध होने में. जरूरतें बहुत ज्यादा हों, तो हम कभी समृद्ध नहीं हो सकते. समृ्द्धि धन से नहीं आंकी जाती. समृद्धि तो धन और जरूरतों के बीच का फासला है। फासला कम है, तो हम समृद्ध हैं, फासला नहीं है, तो हम सम्राट हैं. अगर फासला बहुत ज्यादा है, तो समझो हम दरिद्र हैं.

मान लीजिए, एक व्यक्ति की जरूरतें एक रुपये में पूरी हो जाती हैं और उसके पास दस रुपये हैं, वहीं एक दूसरा आदमी है, जिसके पास पांच अरब रुपये हैं, लेकिन उसकी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो दोनों में समृ्द्ध कौन है ? पांच अरब रुपये वाले के पास उसकी जरूरतों के आधे रुपये हैं, जबकि दस रुपये वाले के पास उसकी जरूरतों से दस गुने. जाहिर है, समृद्ध दस रुपये वाला है.

मेरा मानना है कि समृद्ध व्यक्ति ही धर्म में प्रवेश करता है, लेकिन समृद्धि का अर्थ धन-संपत्ति से नहीं. हमारी जरूरतें इतनी कम हों कि हम जब भी, जैसे भी हों, वहीं समृद्ध होने का अहसास हो. जब जरूरतें थोड़ी होंगी तो जल्दी पूरी हो जाएंगी, तब हमारी उर्जा जीवन यात्रा पर निकलेगी. जब हमारी जरूरतें पूरी होंगी, तो हम दूसरे संसार की यात्रा पर निकल पड़ेंगे. तब हम तैयार हैं, खूटियां छोड़ सकते हैं, पाल फैला सकते हैं. क्योंकि इस किनारे की हमारी जरूरतें पूरी हो चुकी हैं.

अपनी जरूरतों को घटाते जाओ. व्यर्थ को छोड़ते जाओ. जो बहुत जरूरी है, वह बहुत थोड़ा है. बहुत थोड़े में आदमी की तृप्ति हो जाती है. तुम्हारी प्यास के लिए समुद्र की जरूरत नहीं, छोटा-सा झरना ही काफी है. समुद्र से कभी किसी की तृप्ति हुई है? धन तो समुद्र का खारा पानी है, जितना पीते हो, उतनी प्यास बढ़ती है. समुद्र का पानी पीकर आदमी मर सकता है, जी नहीं सकता. छोटे से झरने का चुल्लू भर पानी पीकर भी तृप्त हुआ जा सकता है.

समृद्ध वही है, जो अपनी जरूरतों को जरूरत समझता है और गैर-जरूरतों को गैर-जरूरत. सोने-चांदी से न तो प्यास बुझती है, न हीरे जवाहरातों से भूख. जिसने यह बात समझ ली और व्यर्थ के विस्तार को छोड़ दिया, उसे परम तृप्ति का स्वाद आता है. यही तृप्ति समृद्धि है.

तमाम उपाय प्रवंचना हैं. जो भी दौड़-धूप दिखाई दे रही है कि संसार में बहुत काम हो रहा ह, बड़ी समृद्धि हो रही है, बड़ा विकास हो रहा ह, वह कुछ भी नहीं. इसमें पचास प्रतिशत तो बिल्कुल व्यर्थ है. शेष पचास प्रतिशत ऐसा है, जो युद्ध, संघर्ष, कलह की तैयारी में जा रहा है. पचास प्रतिशत प्रसाधन के साधन हैं कि खो गया सौंदर्य कैसे बचाया जाए या कैसे दिखाया जाए कि खोया हुआ सौंदर्य नहीं खोया है. धोखा, प्रवंचना. पचास प्रतिशत खोए हुए सौंदर्य को धोखा देने के लिए और चालिस प्रतिशत जीवन का अंत करने के लिए कि बचे हुए जीवन पर हाइड्रोजन और एटम बम कैसे गिराया जाए. यह 90 प्रतिशत मनुष्य की सभ्यता है. बाकी दस प्रतिशत बचता है. उस दस प्रतिशत में आधी दुनिया भूखी है. एक जून रोटी नहीं है. छप्पर नहीं है, औषधी नहीं है. क्या यही हमारी सभ्यता है?

अगर हम जीवन की जरूरतों को पूरा करने में लगें, जैसा लाओत्से चाहता है, जैसा मैं चाहता हूं, तो झूठे सौंदर्य प्रसाधनों, झूठी प्रतिष्ठा के उपाय, झूठी महत्वाकांक्षा की तृप्ति में पचास प्रतिशत श्रम का अंत होगा. इसी प्रतिस्पर्धा से पैदा होता है युद्ध, जिसमें चालीस प्रतिशत शक्ति व्यय हो रही है. अगर पूरी नब्बे प्रतिशत शक्ति जीवन की जरूरतों को पूरा करने में लगाई जाए, तो इतनी जरूरतें पूरी हो जाएंगी कि बची हुई विराट उर्जा सेल संस्कृति का निर्माण होगा.

लेकिन उर्जा हो, तब तो संस्कृति का निर्माण हो. अभी तो उर्जा बचती नहीं. अभी हम व्यर्थ के गोरखधंधों में समय व्यर्थ कर देते हैं. हम थके-हारे रात को घर लौटते हैं, किसी तरह सो भी नहीं पाते, क्योंकि दिन में जो चिंताएं इकट्ठी की हैं, वे रात भर पीछा करती हैं. दिन में व्यर्थ की दौड़-धूप और रात बन जाती है दुख-स्वप्न. एक दिन लगता है कि जीवन समाप्त हो गया. क्या यही संस्कृति है?

यह न सभ्यता है, न संस्कृति. क्योंकि इसमें न प्रेम है, न प्रार्थना. इसमें सब दिखावा है. खेत-खलिहान सूखे पड़े हैं और दरबार में रोशनी है. लोग तलवारें लिए खड़े हैं और सम्राट हीरे-जवाहरातों के सिंहासन पर बैठा है. इधर आदमी की बुनायादी जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं. कुछ ज्यादा खाकर बीमार हो रहे हैं, तो कुछ भूख से बीमार हैं. कुछ इसलिए बीमार है कि जीवन को संभालने का उपाय नहीं, कुछ इसलिए बीमार हैं कि उनके पास इतना ज्यादा है कि जानते नहीं करें क्या। यह सभ्यता नहीं, एक असभ्य स्थिति है.

संस्कृति तो तब पैदा होगी, जब लोग तृप्त होंगे और लोगों के पास जीवन बचेगा. अभी जो बचता है, वह युद्ध में चला जाता है. युद्ध संस्कृति नहीं भयानक रोग है. लेकिन अगर हम लाओत्से को सुनें, महापुरुषों को सुनें, तो दूसरी व्यवस्था पैदा होगी. इस व्यवस्था का आधार यह होगा कि हमारी जरूरतें पूरी होनी चाहिए. लेकिन जरूरतें तो बहुत कम में पूरी हो जाती हैं. असली काम गैर-जरूरतों को छांटना है, उन्हें जरूरतों से अलग करना है. समृद्ध वही है, जिसकी जरूरतें अल्प में पूरी हो जाती हैं और पूरा जीवन शेष रह जाता है. उसकी पूरी उर्जा बच जाती है. उस उर्जा को वह सृजन में, संगीत में, समाधि में लगा सकता है, जो उसे परमात्मा तक ले जाती है.

(दैनिक जागरण से साभार)

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